Wednesday, December 16, 2009

कौन खुश hai

बारिश की गिरती हुई
बिन्दो के बीच चाय की चुस्कियों का
मजा ही कुछ और है
अपने आठवी मंजिल के फ्लैट स
देखता हु सामने कुछ मजदूरो को
गित्तिया उठातेहुए
आपस में बतियाते हुए
कुछ गप शाप लड़ाते हुए
और बारिश के बीचा चाय की
चुस्किया लेते हुए

तभी मेरे दिमाग में ख्याल आता ही
की किसकी चाय में ज्यादा मजा होगा
मेरे और नीचे बैठे उन मजदूरो में
कौन ज्यादा खुश होगा

मैं तो कमाता हु लाखो में
इन मजदूरो की तो औकात ही क्या है
ये कुछ सो सौरूपये में आते हें
न इनके पास फ्लैट है ये तो
जमीन पे भी सो जाते हें
न ही इनके पास कार है
ये तो साइकिल स ही काम पे जाते हें

पैर तभी मेरे बोसे का फ़ोन आया
उसने मुझे तभी ऑफिस बुलाया
मेरे मुह स चाय छुट गयी
और मैंने दफ्तर जाने का प्लान बनाया

आज तो लगता है रात दफ्तर में ही
बितानी है
काम के बोझ स जिंदगी नरक बन जानी है
जैसे ही घर स बहार निकालता हु
देखता हु अभी भी उन मजदूरो को
आपस में बतियाते हुए
गप्पे लड़ाआते हुए
चाय की चुस्कियों का मजा लेते हुए।


Saturday, December 5, 2009

उस अकेली खड़ी लड़की पे

अकसर उस राह से गुजरते
मेरी नजर पड़ जाती थी
उस अकेली खड़ी लड़की पे
कभी गौर किया नही
या कहो की समय मिला नही
उस अकेली खड़ी लड़की पे
देखा था उसे सरे रह लोगो से बतियाते
कभी किसी को दुत्कारते
तो कभी किसी के साथ जाते
हमेशा अचम्भा था की कौन है
कभी नजर न गिराई
उस अकेली खड़ी लड़की पे

देखा एक दिन उसे रोते हुए
तो मन में कसक उठी
उससे बाते करने की
मालूमात करने की
की क्या वजह रही होगी
उसके यु अंशु बहाने की
यु लोगो को अपना दुःख दिखाने की

मैंने यु ही पूछा की क्या बात हुई
देवीजी की आप इतनी खफा है
कोई गम है या कोई बात है
सब ठीक तो हालात है?

उसने बोला की वो जिस्म बेचा कर
रोटी कमाती है
उसी कलि कमाई से अपना
छोटा सा घर चलाती है
अपनी छोटी बहन और अपने भाई को
बनाना चाहती है इंसान भला
इस कलि दुनिया के फेर से
उनकी जिंदगी महफूज रखना चाहती है

आज ३ दिन से मिला नही कोई
ग्राहक नया
और जला नही है घर में उसके
२ दिन से चुल्हा

इसी बात का डर सताता है उसे
यही वजह रुलाता है उसे

मैंने कहा छोड़ क्यों नही देती
आप ये धंधा जो है गिरा हुआ
पैर उसने कहा जी कौन नही है
अपने ईमान से फिरा हुआ

यहाँ कम से कम लोग भूख मिटाने ही आते हैं
बहार दुनिया में तो है भूखे भेदिये
जो अच्छे अच्छे इंसानों को खा जाते है

नही जरुरत उसे मेरी नसीहत की
यहाँ तो हर कोई नोचने ही आता है
कहा की को भावनाओ का
मूल्य समझ में आता है

कुछ शेर की खाल में भेदिये हैं
तो कुछ उससे भाई है गिरे हुए
यहाँ कोई नही ईमान वाला
सबके ईमान है फिरे हुए

क्या करना है ऐसी दुनिया की परवाह करने से
रोजी रोटी चलती नही
इमानो पे मरने से

मैं खड़ा रहा किन्किर्त्वय्मूध कुछ बाते
सोचे जाने को
अपने इस समाज की कलि सच्चाई
अपने आप को समझाने को

यहाँ नही कोई मानवता का मूल्य
यहाँ तो सब हवस में हैं अंधे
बेबस मजबूर प्रताड़ित लडकियों
के liye बस ये ही बचे हैं dhandhe

क्या बोलता मैं उसे
स्वयं ही सोच रहा की की कैसे
हम हो गए है इतने संवेदना रहित
जगह नही है उनको समाज की खिड़की पे
आज भी मेरी नजर बार बार जाती है
उस प्रताड़ित अकेली खड़ी लड़की पे



Tuesday, December 1, 2009

आज बुखार में ताप रहा बदन
कहना चाह रहा कुछ
इसे भी कुछ विश्राम चाहिए
इस भाग दौड़ की दुनिया से
आराम चाहिए।

कभी तो हमे समय की कमी
पुरी होती नही
न ही कभी ठौर मिलता है
जिंदगी की हसीं यादो को
भुला बैठे है
जिन्होंने साथ छोड़ना था छोड़ दिया
अब कहा कोई अपना और मिलता है

नस नस में उठते दर्द से
रह रह के उठती तक बात
कुछ जवाब मांग रही हैं ये
कुछ छुपे हुए सवालात

आज बदन का रोम रोम
दर्द से पुकारता
की हमे विश्राम चाहिए
इस भाग दौड़ की जिंदगानी से
एक अदद आराम chahiye

Sunday, November 29, 2009

अक्सर रह चलते मिल जाते हैं
कुछ मुसाफिर
वैसे तो वो अपने नही होते
पैर अपने होते भी कहा है

ठीक ही तो कहा है कहने वाले ने
की डगर मुश्किल है
दूर बहुत मंजिल है
पैर किसी पे तो विश्वास करना है
किसी को तो अपना कहना है

कोई अपना होके भी साथ छोड़ देता है
कोई पराया भी अपना होता है
कभी दुःख में कभी सुख में
कभी कठिनायों के भंवर में
वो ही साथ निभाते है
जो इस राह में पराये कहलाते हैं'

केवल कुछ शब्द ही नही होते
अभिव्यक्ति भावो की
कभी तो दिल की तरंग पे
कोई साज बजाएगा
अपना नही तो क्या
कोई पराया ही साथ nibhayega

Monday, November 23, 2009

वो दोनों सदा ही आते हैं
अक्सर साथ दिख जाते हैं
कभी देखा नही उनको लड़ते हुए
झगड़ते हुए
कैसे आख़िर एक लड़का और लड़की
इतने प्रेम,स्नेह से रह सकते हैं
इस इर्ष्या,घृणा और नफरत से भरी
दुनिया में
जहा अपने भी साथ नही निभाते
तो परयो से तो उम्मीद ही बेमानी है
मैंने जब भी देखा
उनको साथ खाना खाते हुए
एक दुसरे की चिंता में
ररातें जाग के बिताते हुये
देखते हुए साथ में सपने
खुली आँखों से
करते हुए प्यार की बारिश एक दूजे पे
साडी दुनिया से बेखबर
कभी नही देखा उनकी आँखों में
कोई चिंता का साया
कभी उनके चेहरे पे न
शिकन देखि मैंने

हा कभी आते जाते रसते में लोग
उनपे चिल्लाते हैं
उनको पठारों से दूर भगाते हैं
उनको गलिया सुनते हैं

शायद मैं भूल गया
अच्छे खासे इंसान ही
आज की दुनिया में
पागल पगली कहलाते हैं

Saturday, November 21, 2009

मेरी कहानी सुनो
मैं यही तो हु
तुम्हारे आस पास
तुम्हारे दिए हु उतरन
के सहारे जीने वाला
सर्दी की रातो को
फूटपाथ पे सो के गुजरने वाला
कभी तुम्हारे घर से मिले
तो ठीक वरना भूखे सोने वाला
वही छोटू
वही गन्दा सा बच्चा
जिसे एक बार हिमाकत की थी
तुम्हारे बच्चो के साथ खेलने की
और तुमने मुझे दूर भगाया था
अपने बच्चों को बचाया था
बचाया था मेरी गन्दगी से
मेरे मैले हाथो की चुआन से

अभी कल रत की ही तो बात ही
एक शराबी ने
पीता मुझे बहुत रात को
और तुमने मुझे बचाया था
मेरी इस अदद जिंदगानी पे
एक अहसान फ़रमाया था

मुझे तो ये भी नही पता
कौन है मेरी माँ
कौन है मेरा बापू
मैं तो तुममे ही देखता रहा
अपने पालनहारे
तुम्हारे घर के सामने ही तो आंखे खोली
यही एक दिन मर जाना है

बस गम है इस बात का की
काश मेरा भी घर होता
मैं भी माँ की गोदी में सोता
मेरे भी सपने होते
मैं भी अच्छा कपड़े पहन के स्कूल जाता
अपने बापू से मैं भी प्यार पाटा
पैर सरे अपने पुरे होने के लिए नही होते
अच्छा है मैली आँखों में सपने नही hote

Wednesday, October 28, 2009

हवाओ का कुछ असर है
की आज मौसम खुशनुमा है
एक अजीब सी शरारत है
आज फिजाओ में भी

कभी लम्हों का भी कुछ
सलीका होता है
जिंदगी की नफासत सिखलाने का
और कुछ नया बतलाने का
कभी मिल जाते हैं यु ही
अक्सर रह चलते मुसाफिर
तो कभी अपनापन नही
मिल पाताअपनों में भी

कभी शरियत से दूर भी
खुदा की इबादत होती है
कभी मस्जिद में जाके भी
नमाज का मुका छुट जाता है

कभी परयो में भी अपने मिल
जाते हैं इस कदर
की उपर वाले की रहमत में
सुकून नजर आता है

कभी गुमनामी में पसरे अंधेरो
से भी आती है एक रोशनी
कभी उजालो में भी
सर छुपाये रहते हैं हम
कभी दिल की बाते बताने में
लग जाते हैं सालो
कभी इश्क घर बैठे हो जाता है

कभी हर बात में रंजो गम की
तफसील होती है
कभी इशारो में भी
इश्क परवान चढ़ जाता है

वह रे खुदा क्या दुनिया बनाई
है तुने गजब की
कभी दूर लगता है तू तो
कभी दिल में मक्का मदीना नजर आता है
बारिश की बूंदों में खेलते
बच्चो की किल्कारिया
कितनी खुश औरमासूम है
जिंदगानी उनकी
न मन में कोई शिकवा
न कोई गिला किसी से
अपने में मस्त बसाये
रहते हैं अपनी छोटी सी दुनिया
ये बच्चे समझाते हैं हमे
इस जिंदगी का असली मतलब
असली मकसद
एक तरीका जिंदगानी बिताने का
हर चल फरेब से दूर ये बच्चे
हमे सलीका सीखते है
नफासत से जिंदगी बिताने का
ये देते है हमे सीख
की कैसे बिना दुसरो का बुरा किए
भी अच्छाई से नाता जोड़ा जाता है
कैसे घृणा इर्ष्या से दूर रह कर
ही प्रेम जिंदगी में आता है
कैसे कुछ त्याग करके मिलती
है खुसी अपार
इस छल कपट से परे भी
हो सकता है इक संसार
काश हर कोई बच्चा बन जाता
फ़िर दुनिया में न कोई दुखी रह पता
सब रहते अपने में मस्त
और न होते दुसरे की खुसी से ट्रस्ट
ये बच्चे भी कैसी बाते सिखलाते हैं
हमे जीने का सलीका बतलाते है

Wednesday, October 21, 2009

ये तेरी दिवाली
ये मेरी दिवाली
तेरे घर के गुलशन हर कोने में
चमकते दियो की रोशनी
कोना कोना जगमगा रहा
मेरे घर पे कब्रिस्तान का
साया है मंडरा रहा
मेरे यहाँ भी रोशनी है
पैर एक वक्त की रोटी की आशाओं की
मेरे घर भी जगमग है
मेरी अधूरी तमन्नाओ की
लोग तो आते तेरे घर भी है
मिलने को बतियाने को
इस दिवाली के मौके पैर
तेरे यहाँ खुशिया बंटाने को
तेरे घर से आती खुशबु
उन मिठाईओ की
मेरे घर भी लोग आते हैं जाते है
पैर मुझे दुत्कारने को
मेरे यहाँ भी आती है खुशबु
पैर मेरे मन में छुपी ख्वाहिशो की
तेरे बच्चे भी खुश है रोते हैं
मचलते हैं पटाखे छुडाने को
और नाराज हो जाते हैं
मेरे यहाँ भी बच्चे रोते है
पैर भूख से बिलबिलाने को
तेरे घर की जलती बुझती रोशनियों से
गरम होते मेरे आशियाने को
आज भी इन्तेजार है अगली दिवाली का आने को
तेरे इतना बड़े घर में भी सच की कंगाली है
मेरी इस छोटी सी झोंपडे में बसती तंगहाली है
ये तेरी दिवाली है
ये मेरी दिवाली है

Saturday, October 10, 2009

मेरे इरादे जान ले तू
हामुझे पहचान ले तू
मेरी हर नाकाम कोशिश
को अदद अंजाम दे तू
कब से गडाये बैठा हु मैं
निगाही तेरी रहो पैर
कब से सजाये बैठा हु मैं
सपने तेरे वायदों पर
वो वायदे जो तुने किए
साथ मेरा निभाने को
हर पल हर लम्हा
मेरे साथ बिताने को
देने मेरा साथ मेरे हर बुरे वक्त में
और मेरे हर गम में हाथ बंटाने का
तेरे सरे
ये हवा में उड़ते पत्ते
कहते इक अनजान कहानी
कभी ये भी किसी साख पे लगे हुए
इनकी भी थी एक जिंदगानी
ये भी बसाये थे बसेरा अपना
जुड़े हुए थे जड़ो से अपनी
झोके हवा के लगने पैर भी
विश्वास था इनके मन में
विश्वास था इक साथ का
एक अहसास का
की किसी भी पल में
जो न डगमगायेगा
चाहे आहे कितने भी तूफ़ान
इनका पेड़ साथ निभाएगा
नियति को कोई जान न पाया
पेल भर में ही जुदा कर दिया
एक जोर की आंधी ने
दूर कर दिया इनको इनके विश्वास से
छूट गया वो बसेरा
और बहा ले गया इनको नए संसार में
जहा कोई ना था इनका अपना
ना कोई साहारा था न कोई सपना
पैर ये फ़िर भी अडिग रहे
फ़िर से अपने संबल को संजोया
फ़िर से शुरू की एक नयी कहानी
फ़िर से जिंदगी के धागों को पिरोया
फ़िर से करने को अक नयी शुरुआत
फ़िर से बसाने को अक नया जहाँ
फ़िर से सँभालने को टूटे अरमान
फ़िर से पाने को अपना अस्तित्व

Wednesday, October 7, 2009

जर्रा जर्रा संवाद करे
रह रह कर तुझको याद करे
तेरे उस भोलेपन को जालिम
मिलने के ये फरियाद करे
कब उस निश्चल हँसी को पायेगा
ये दिन गिन गिन के रात करे
तेरी एक छवि सुहानी पाने को
ये रह रह कर फरियाद करे

तू अति सुंदर रूकी मालिक है
ये तेरे हुस्न का प्यासा है
तू कोमलांगी मृगनयनी है
इस दिल को तेरी अभ्लाषा है
जाने कब वो दिन आएगा
जब तू मेरे जीवन में आएगी
तू मेरी इस सुनसान जिंदगी में
सावन की रिम झिम लाएगी

मैं तेरी पूजा करता हु
दिन रात आहे भरता हु
तुझमे अपना भगवान् बसा के
तेरी तस्वीर मदिर में रखता हु

कब ख़तम होगा मेरा ये इन्तेजार कठिन
तू कब मुझसे मिलेगी और
कब मेरी तमन्ना पुरी होगी
कब तू मुझसे शर्माएगी
ये इन्तेजार तो काफ़ी हु
कब मिलने की रुत आएगी


Tuesday, October 6, 2009

pyar

कभी मैं जाता था अनिश्चय ही
उस घोर अन्धकार में
जहा हीनता पनप चुकी
और घर कर चुकी
उस संसार में
मेरी यादो के पिटारे को
यु खोल्हा तो व्यर्थ है
मेरी संवेदनाओ का
अब कही कोई मूल्य नही

क्यों कहते है लोग की
अबूझ पहेली है ये संसार
मैं तो अभी तक अकथ अनकहा
सच ही रह गया
मेरी उन्मादी भावनाओ को
समझा के भी
मैं इक छोटा सा संवाद रह गया

कब पहचानेगा ये जग मेरा मूल्य
की कभी कोई शुरुआत करेगा
मेरी बलि वेदी पे चढ़ता रहा है
हमेशा मानवीय मूल्यों का रक्त

मैं तो तुम्हारे ही दिल का एक टुकडा था
मुझे तुमने अलग किया
आज जब जरुरत है तुम्हे मेरी
तो भी तुम अनजान बनते हो

आओ मुझे पहचानो
अपने अंदर के उस स्नेह का मोल जानो
बढ़ जाओ लेके मसाल उस प्यार की
जिसका अब को मूल्य न रहा

मैं बसता हु हर मानव मात्र की रगों के
बस एक बार दिल से बुलाओ
इससे पहले की मैं खो दू अस्तित्व अपना
तुम मुझे फ़िर से जगाओ
मेरी तंगहाली देख के
होता खुश ये सारा जमाना
मैंने तो छोड़ी सारी अभिलाशाये
मुझे नही अब यहाँ ठौर बनाना
मेरी अभिव्यक्ति की बंदिश को
मैं देख नही सकता यु
खुली आँखों से
इससे पहले समाप्त करू मैं
अपनी अजब कहानी को

मेरी पैरवी का वक्त नही है
मैं तो ठहरा एक निश्छल धारा
मेरे शब्दों को याद रखेगा
मेरे पीछे ये संसार सारा

मैं कहता हु की मेरी खुशिया
तो बस चुकी उस फ़कीर की यादो में
जो आज भी मदमस्त होके
घूम रहा आवारा सडको पे

मैं अपनी मन की करने वाला
मुझे कहा भये ये उन्मादी
कही कोई हिंसा करता है
कही अनैतिकता ही आजादी

आज न मुझसे कहने तुम रुकने की
मैं जाता हु लेके ये अपना पिटारा
एक ऐसे जहा की और चला मैं
जहा बहती हो प्यार स्नेह की धारा

Thursday, October 1, 2009

वो झिलमिलाती चांदनी से
छल के आती रौशनी
वो जगमगाते दीपकों की
टिमटिमाती रोशनी
वो शादी के शामियाने में स्
आ रही गानों की आवाज
वो नन्हे नन्हे हाथो में पकड़ी हुई
बिजलियों की रोशनी
किसी के घर के द्वार पे वो
कैसे उजाला बिखरा रहे
और इस छोटी उमर में कितना बोझा
उठा रहे
कहने को तो शादी की जगह को रोशनी से
भर रहे
पैर अपनी आँखों के आंसुओ को
दिल में जज्ब कर रहे
कोई उन्हें छोटू पुकारे
कोई सी सी कह के बुला रहे
कोई दे इन्हें भद्दी सी गाली
कोई झिद्कार से दूर भगा रहे
शादी के इससजीले मंडप मे
ये मैले कपडे पहने हुए
क्यों अपनी नन्ही आँखों से
खाने की और ताकते
क्या मालूम नहीं ईनको की ये
बीस रूपये भाड़े पे आते हैं
ऐसे सुहाने सपने ऐसे छोटी
आँखों को नहीं सुहाते हैं
ये कर रहे इन्तेजार कुछ झूठन बच जाने


इन चमकती बिजलियों के बंद हो जाने का
इन झिलमिलाती रोशनियों के मद्दम हो जाने का
वो ही हाथ जो अब तक थामे थे
जिल्मिलाती रोशनी

Wednesday, September 16, 2009


मेरे अपने मेरे से जवाब मांगते हैं

मेरी सांसो का मुझसे हिसाब मांगते हैं

कभी हमारी बातो में झलकता था प्यार उनको

आज वो ही हमसे प्यार की वजह मांगते हैं

कभी अकेले में जिनको हमारा साथ लगता था सुकून

आज वो ही हमसे दूर जाने की दुआ मांगते हैं

ऐसे अपनों से तो गैर ही अच्छे कम से कम

हमसे हमारी जानतो मांगते हैं

Sunday, September 6, 2009

मातृभूमि की ललकार

आज मैं फिर से जाग गया हु
अपने शोर्य को पहचान लिया है
फिर से मेरी उंगलियों ने मुट्ठी का रूप ले लिया है
और मेरी बाजुए फड़कने लगी हैं

आज फिर मेरे माथे की शिकन ने चिंतन का रूप लिया है
आज फिर मेरे अंडर धधकती प्रितिशोध की ज्वाला जल उठी है
आज फिर मेरे पैरो की छाप लगने वाली है
अब न कोई रात अमावस सी काली है

आज फिर मेरे शौर्य की गाथाये जमाना जायेगा
अब फिर से एक नया इतिहास लिखा जायेगा
अब फिर कोई अत्याचारी न जुल्म ढहा पायेगा
अब न फिर कोई कंश बन पायेगा

लाओ मुझे दे दो मेरे अस्त्र शास्त्र
पहना दो मुझे रन की पोशाक
मेरे फड़कते बाजुओ में थमा दो तलवार
अब दुनिया सुनेगी इसकी टंकार

अब मैं ना अपनी भावनाओ को हावी होने दूंगा
अब मैं युध को युध्ध की तरह से लडूंगा
आब न कोई मुझको हरा पायेगा
अब न कोई मेरी होते हुए मेरी धरा को रौंद पायेगा

अब जब तक मेरे सर पे मुकुट
धड पे सर है
तब तक न कोई नापाक इरादा इसको जमींदोज कर पायेगा
अब मेरी लाश ही मुझे मेरे इरादों से डिगा पायेगी
या तो मिटा दूंगा हर आततायी को या मेरी लाश बिच जायेगी

कर दो मेरे माथे पे तिलक मेरे रन की घडी आई है
अब नीद से जाग गया मैं
मेरी मातृभूमि ने मुझे फिर से आवाज लगाई है

Saturday, September 5, 2009

बारिश की बूंदों

ऐ बारिश की बूदों
मुझको ना ऐसे सताओ
मेरी विरह की बेला में आके
मेरी पीडा न यु बाधाओं

मैं तो विरह में संतप्त
एक विरहिणी सन्यास में
मेरे अकेलेपन में एके
न मुझे ऐसे सताओ

जाओ जाके उन प्रेमियों को
समय दो उल्लास का
जो आज भी सच्चाई से
दूर हो के जी रहे हैं

जाके बरसों उन बच्चो में
जो मस्त हैं तेरे अंचल में
जो आज भी माँ के साये में
एक नयी कहानी सी रहे हैं

जाके बरसों उन खेतो में
जो आशाओ का भंडार बने है
और उनपे निर्भर किसान भी
कर्ज के कीचड़ से सने हैं

अरे जाके पानी दो उन प्यासों को
जो आंसुओ को पी रहे हैं
और अपनों की अर्थी आँखों के सामने
उठता देख भी जी रहे हैं

मैं तो हु केवल एक वियोगिनी
जो पल पल प्रियतम को पुकारू
मेरे कलेजे को ठंडक दे सके
ऐसी कोई घड़ी निहारु
मुझे नही जरुरत तुम्हारी
मेरी आंखे मेरे स्वामी दर्शन को तरसे
फ़िर क्यों यहाँ बेवक्त आके
मेरे अंगान में तू बरसे

Sunday, August 30, 2009

क्यों

वो दूर गगन में उड़ते पंची
वो घर जाते गायो के
झुंडवो किलकारी मरते बच्चो के रेले
वो रात भर सुनना माँ की लोरी
वो पनघट पे जाती
नौव्युव्तियावो खेतो से आते नौजवान
वो भोर के सूरज की लाली संग
दूर किसी मस्जिद की अजान
वो सावन के झूलो का लगना
वो बारिश की बूदों का गिरना
वो माँ के अंचल में चुप
जानाऔर रस्ते में भागते धुल उडाना
वो बूढी दादी की कहानिया
वो बिल्ली के प्यारे से बच्चे
रह गया सब कुछ itnaaपीछे
मेरा मन मुझसे आज भी पुच्छे
क्यों आगे बढ़ना छोड़ देता है
बचपन की सुहानी यादो को
क्यों अपने अतीत की कहानियो को
सेज के रखते हैं हम
क्या उनका वजूद है केवल सुनाये जाना
एक पीढी से दूसरी पीढी को
क्यों पराये हो जाते है हम
इतनी जल्दी अपनी माट्टी से
क्यों खो जाते हैं अपनी इस दुनिया में जिसका कोई अस्तित्व नहीं .

Friday, August 28, 2009

samay

आज के साये में
कल छुप के आता है
कभी सामने तो कभी पीछे से
नए नए करतब दिखता है

मनुष्य तो केवल एक
मध्यम मात्र है
ये तो समय ही है
जो उसे अपनी उंगलियों पे नचाता है

गुजरे हुए कल की कुछ
अनछुई सी कविताये लेकर
आने वाले पले से पहले
उनका बिम्ब दिखाता है

ये सबसे बड़ा आलोचक है
जो आपकी हर कृति पे
अपनी चाप छोड़ जाता है
कभी अहसास से तो कभी अभ्यास से
नए नए अध्याय सिखाता है

ये आपके हर पल में भागीदार है
और आपकी हर परेशानी में साझेदार है
बिना आपका हाथ थामे भी ये
हर कठिनाई में मदद गार ही

ये तो मनु की परवर्ती ही ही ऐसी
की वो इच्छाओं के दामन में फंस कर
भूल जाता ही वो सुख की घडिया
और उसे दुर्भाग्य समझता ही
अन्यथा समय तो हमेशा
सौभाग्य ही बनकर आता है

इसको क्या नाम दू ?

जलालत भी मिले दर पे उसकी तो क्या
सुकून दीदार-ए-यार तो मिल जायेगा
वो मजबूरी को गैरत समझे तो क्या
उनका अल्फाज तो कानो में जायेगा
हम बेकदरी का देके इम्तिहान भी
न उनको प् सके तो क्या
इस बहाने उनके जेहन में हमारा ख्याल तो आएगा
हमारी बेपनाह मुहब्बत को जेल किया सरे आम तो क्या
इसी बहाने उनका बेपनाह हुस्न तो नजर आएगा
हम इश्क के इम्तिहान में बजी न मार सके तो
क्याहमारा नाम तो आशिको में गिना जाएगा
जीते जी न उनको प् सके तो क्या
मरने के बाद भी हमारी कब्र पे उनके नाम का फातिहा तो पढ़ा जायेगा

रोशनी

हर सुबह प्रकाश से तर हो
ज्यूँ निकले रोशनी
चारो दिशाओ को प्रफुल्लित
कर रही ज्यूँ रोशनी
कभी गम के अँधेरे में
कभी दुखो के साये में
कभी अपने अहसासों में
खो रही ज्यूँ रोशनी
कभी अपनों से दूर हो के
कभी सपनो से दूर हो के
अपनी आशाओं को जलाकर
आ रही ज्यूँ रोशनी
बिना थके बिना रुके
स्वयं की न परवाह किये
दूजो की चिंता में मनो
जल रही यु रोशनी
है कोई न तुझसा
आत्मा के दीपक
दुसरो के हित में लगाये
निरंतर धर्म का अपना
पालनकर रही यु रोशनी

Friday, August 14, 2009

धुंध में एक साया



कभी अनजाना saa कभी पहचाना सा
बहुत दूर था कभी to
कभी मेरे बहुत करीबथा
वो धुंध में एक साया
क्यों चाह कर भी वोकः न सका मुझसेमेरे सबसे करीब होके भिदुर था मुझसे
मैंने महसूस की थीउसकी सांसो की गर्मिउसके अन्तेर्मन की कशिशुसके हाथो की नरमी
सुनाई देता था मुझेउसके दिल का धड्कनाख्वाहिश उसके बेपनाह चाहने किरुमनियत उसके नजदीक आने की
महसूस किया था सब मैनेबिना बोले बिना बताययूसकी हर नब्ज पढ़ी थी मैनेबिना कभी उसके जताए
मेरी अकेली रातो मुस्की आहत सुकून देती थिमेरी खामोश तनहइयो मुस्की झलक खुशिय्स भर देती थी
वो मेरी सांसो में था समयावो मेरे हर पल में साथ नजर आयौसकी यादो न कभी भुला पायथा वो धुंध में एक साया

Sunday, August 9, 2009

कभी to

कभी तो तेरे दिल में भीकुछ हुआ होगा
कभी तो तुझे भी तनहइयो ने छुआ होगा
लोगो ने तो मुझे ही पत्थर मारेऔर
मुझे पागल कहाकभी तो तुने भी अपने प्यार का पागलपन महसूस किया होगा
कभी तो तू भिरोयी होगी अकेले मेकभी तो तुने भी मेरेख्बाब संजोये होंगे
कभी तो तुने भी मेरी तस्विर्सिर्हने राखी होगीऔर कभी तो तुने भी मेरे नामकी मन्नत मांगी होगी
या मैं ही तुझे न पाने के गम में यु घूमता रहतुझे पाने की खातिर हर मन्दिर का डर चूमता रहा
हर पल तेरी यादो के सजदे में जिया और हर पल तुझे में हिराब का दीदार किया
फ़िर तुने क्यों मेरी तनहइयो को मेरी तंगहाली से जोदौर मेरे उस पाकीजा प्यार कोइस तरह छोड़ा
पैर मैंने तो जिंदगी तेरे नाम की हैआज चाहे अका ही इस जहा को अन्तिम सलाम फार्म रहा हुतेरा साथ तो मुझे न मिल पाया इस जिंदगी मेपेर तेरी यादो के साथ ही कब्र में दफनाया जा रहा हु


मेरा aashiyana

कब्रों के मजमे में बैठा हूँ,
कहीं से कोईं आवाज़ नहीं आती

मैं दर्द किससे कहूं अपना
मुर्दों के समझ कोई बात नहीं आती

गम का एहसास तो जिंदा-दिलों को होता है
लाशों से क्या फरियाद करू मैं

अब तो खामोशी ही है साथी मेरी

खामोशी ही अच्छी है

कम से कम गम में साथ तो देती है

वरना जिन्दा लाशों के शहर में तो मौत का साया मंडराता है
जिन्दा अक्सों में भी मुर्दों सा सकूं नज़र आता है

कोई जिल्लत को जिंदगी समझ जिए जाता है
कोई फरेब की मौत को गले लगता है
कोई करता है अपनी गद्दारी पे गुमान तो
कोई अपने उसूलो को तक पे रख के सो जाता है

मैं तो आज इस कब्रिस्तान में ही खुश हु
मेरे साथ रोते नही तो क्या
मुझसे हमदर्दी तो जताते हैं
ये मुर्दे जीते जी नही तो क्या
मरने के बाद तो साथ निभाते हैं

Thursday, January 29, 2009

slumdog millenaire

hi ,ut sudde
i saw this movie and felt very bad that how they can project my own india like this.than i saw mr.AB's blog and my feelings became more sound but sudenly i felt something running in my mind and all my memories started flowing my mind:-
1.what is wrong if dany has shown riots ,we ll know that in india we people start fighting on any issue regardless of feelings of a common indian man.sometime it is hindy v/s muslim and some time hindy v/s christanor some time it is notrth indian v/s marathi.we become so much rrogant on thes all small issues which can be handled easily.
2.Is there no slum in india and if we take mumbai as an example we can see at what rate slums are increasing and our politicians who are so muchh angry on this take are more than happy to provide fake ID to bangladeshis.
3.Still in mumbai there are thousand of little gals are pushed in prostitution and all our police know about it.
4.In india it is till easy to get an admission in a gang (Fascinated by BHAI's life) rather than getting admission in a school.
5.In mumbai there are beggars groups which are using small kids and forcing them to beg on streets and now it has become a business of crores.
6.There are many IAS IES,scintists who dont even get a chance to prove them becuase our reservation system has made them mad.
This all is not fake i would suggest that we all should know the fact even after 60 years of independence we are nowhere or we are scared to let other countries know that we indian have a short term memory lose.

Monday, January 26, 2009

kashish

kabhi koi kashish thi mere dil me
jise na main chupa saka
kabhi koi saya tha ek
jise na main pa saka
kai aaye aur kai gaye
per koi na samajha saka
ki kaunsi kashish hai ye
ki kaunsi tadap hai ye
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह
नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन
दूर दूर तक विस्तृत था हिम स्तब्ध उसी के हृदय समान, नीरवता-सी शिला-चरण से टकराता फिरता पवमान
तरूण तपस्वी-सा वह बैठा साधन करता सुर-श्मशान, नीचे प्रलय सिंधु लहरों का होता था सकरूण अवसान।