Friday, August 28, 2009

samay

आज के साये में
कल छुप के आता है
कभी सामने तो कभी पीछे से
नए नए करतब दिखता है

मनुष्य तो केवल एक
मध्यम मात्र है
ये तो समय ही है
जो उसे अपनी उंगलियों पे नचाता है

गुजरे हुए कल की कुछ
अनछुई सी कविताये लेकर
आने वाले पले से पहले
उनका बिम्ब दिखाता है

ये सबसे बड़ा आलोचक है
जो आपकी हर कृति पे
अपनी चाप छोड़ जाता है
कभी अहसास से तो कभी अभ्यास से
नए नए अध्याय सिखाता है

ये आपके हर पल में भागीदार है
और आपकी हर परेशानी में साझेदार है
बिना आपका हाथ थामे भी ये
हर कठिनाई में मदद गार ही

ये तो मनु की परवर्ती ही ही ऐसी
की वो इच्छाओं के दामन में फंस कर
भूल जाता ही वो सुख की घडिया
और उसे दुर्भाग्य समझता ही
अन्यथा समय तो हमेशा
सौभाग्य ही बनकर आता है

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