| हर सुबह प्रकाश से तर हो ज्यूँ निकले रोशनी चारो दिशाओ को प्रफुल्लित कर रही ज्यूँ रोशनी कभी गम के अँधेरे में कभी दुखो के साये में कभी अपने अहसासों में खो रही ज्यूँ रोशनी कभी अपनों से दूर हो के कभी सपनो से दूर हो के अपनी आशाओं को जलाकर आ रही ज्यूँ रोशनी बिना थके बिना रुके स्वयं की न परवाह किये दूजो की चिंता में मनो जल रही यु रोशनी है कोई न तुझसा आत्मा के दीपक दुसरो के हित में लगाये निरंतर धर्म का अपना पालनकर रही यु रोशनी |
Friday, August 28, 2009
रोशनी
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