Friday, August 28, 2009

रोशनी

हर सुबह प्रकाश से तर हो
ज्यूँ निकले रोशनी
चारो दिशाओ को प्रफुल्लित
कर रही ज्यूँ रोशनी
कभी गम के अँधेरे में
कभी दुखो के साये में
कभी अपने अहसासों में
खो रही ज्यूँ रोशनी
कभी अपनों से दूर हो के
कभी सपनो से दूर हो के
अपनी आशाओं को जलाकर
आ रही ज्यूँ रोशनी
बिना थके बिना रुके
स्वयं की न परवाह किये
दूजो की चिंता में मनो
जल रही यु रोशनी
है कोई न तुझसा
आत्मा के दीपक
दुसरो के हित में लगाये
निरंतर धर्म का अपना
पालनकर रही यु रोशनी

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