| वो दूर गगन में उड़ते पंची वो घर जाते गायो के झुंडवो किलकारी मरते बच्चो के रेले वो रात भर सुनना माँ की लोरी वो पनघट पे जाती नौव्युव्तियावो खेतो से आते नौजवान वो भोर के सूरज की लाली संग दूर किसी मस्जिद की अजान वो सावन के झूलो का लगना वो बारिश की बूदों का गिरना वो माँ के अंचल में चुप जानाऔर रस्ते में भागते धुल उडाना वो बूढी दादी की कहानिया वो बिल्ली के प्यारे से बच्चे रह गया सब कुछ itnaaपीछे मेरा मन मुझसे आज भी पुच्छे क्यों आगे बढ़ना छोड़ देता है बचपन की सुहानी यादो को क्यों अपने अतीत की कहानियो को सेज के रखते हैं हम क्या उनका वजूद है केवल सुनाये जाना एक पीढी से दूसरी पीढी को क्यों पराये हो जाते है हम इतनी जल्दी अपनी माट्टी से क्यों खो जाते हैं अपनी इस दुनिया में जिसका कोई अस्तित्व नहीं . |
Sunday, August 30, 2009
क्यों
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment