कब्रों के मजमे में बैठा हूँ,
कहीं से कोईं आवाज़ नहीं आती
मैं दर्द किससे कहूं अपना
मुर्दों के समझ कोई बात नहीं आती
गम का एहसास तो जिंदा-दिलों को होता है
लाशों से क्या फरियाद करू मैं
अब तो खामोशी ही है साथी मेरी
खामोशी ही अच्छी है
कम से कम गम में साथ तो देती है
वरना जिन्दा लाशों के शहर में तो मौत का साया मंडराता है
जिन्दा अक्सों में भी मुर्दों सा सकूं नज़र आता है
कोई जिल्लत को जिंदगी समझ जिए जाता है
कोई फरेब की मौत को गले लगता है
कोई करता है अपनी गद्दारी पे गुमान तो
कोई अपने उसूलो को तक पे रख के सो जाता है
मैं तो आज इस कब्रिस्तान में ही खुश हु
मेरे साथ रोते नही तो क्या
मुझसे हमदर्दी तो जताते हैं
ये मुर्दे जीते जी नही तो क्या
मरने के बाद तो साथ निभाते हैं
Sunday, August 9, 2009
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