| ऐ बारिश की बूदों मुझको ना ऐसे सताओ मेरी विरह की बेला में आके मेरी पीडा न यु बाधाओं मैं तो विरह में संतप्त एक विरहिणी सन्यास में मेरे अकेलेपन में एके न मुझे ऐसे सताओ जाओ जाके उन प्रेमियों को समय दो उल्लास का जो आज भी सच्चाई से दूर हो के जी रहे हैं जाके बरसों उन बच्चो में जो मस्त हैं तेरे अंचल में जो आज भी माँ के साये में एक नयी कहानी सी रहे हैं जाके बरसों उन खेतो में जो आशाओ का भंडार बने है और उनपे निर्भर किसान भी कर्ज के कीचड़ से सने हैं अरे जाके पानी दो उन प्यासों को जो आंसुओ को पी रहे हैं और अपनों की अर्थी आँखों के सामने उठता देख भी जी रहे हैं मैं तो हु केवल एक वियोगिनी जो पल पल प्रियतम को पुकारू मेरे कलेजे को ठंडक दे सके ऐसी कोई घड़ी निहारु मुझे नही जरुरत तुम्हारी मेरी आंखे मेरे स्वामी दर्शन को तरसे फ़िर क्यों यहाँ बेवक्त आके मेरे अंगान में तू बरसे |
Saturday, September 5, 2009
बारिश की बूंदों
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