Sunday, September 6, 2009

मातृभूमि की ललकार

आज मैं फिर से जाग गया हु
अपने शोर्य को पहचान लिया है
फिर से मेरी उंगलियों ने मुट्ठी का रूप ले लिया है
और मेरी बाजुए फड़कने लगी हैं

आज फिर मेरे माथे की शिकन ने चिंतन का रूप लिया है
आज फिर मेरे अंडर धधकती प्रितिशोध की ज्वाला जल उठी है
आज फिर मेरे पैरो की छाप लगने वाली है
अब न कोई रात अमावस सी काली है

आज फिर मेरे शौर्य की गाथाये जमाना जायेगा
अब फिर से एक नया इतिहास लिखा जायेगा
अब फिर कोई अत्याचारी न जुल्म ढहा पायेगा
अब न फिर कोई कंश बन पायेगा

लाओ मुझे दे दो मेरे अस्त्र शास्त्र
पहना दो मुझे रन की पोशाक
मेरे फड़कते बाजुओ में थमा दो तलवार
अब दुनिया सुनेगी इसकी टंकार

अब मैं ना अपनी भावनाओ को हावी होने दूंगा
अब मैं युध को युध्ध की तरह से लडूंगा
आब न कोई मुझको हरा पायेगा
अब न कोई मेरी होते हुए मेरी धरा को रौंद पायेगा

अब जब तक मेरे सर पे मुकुट
धड पे सर है
तब तक न कोई नापाक इरादा इसको जमींदोज कर पायेगा
अब मेरी लाश ही मुझे मेरे इरादों से डिगा पायेगी
या तो मिटा दूंगा हर आततायी को या मेरी लाश बिच जायेगी

कर दो मेरे माथे पे तिलक मेरे रन की घडी आई है
अब नीद से जाग गया मैं
मेरी मातृभूमि ने मुझे फिर से आवाज लगाई है

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