Wednesday, October 28, 2009

हवाओ का कुछ असर है
की आज मौसम खुशनुमा है
एक अजीब सी शरारत है
आज फिजाओ में भी

कभी लम्हों का भी कुछ
सलीका होता है
जिंदगी की नफासत सिखलाने का
और कुछ नया बतलाने का
कभी मिल जाते हैं यु ही
अक्सर रह चलते मुसाफिर
तो कभी अपनापन नही
मिल पाताअपनों में भी

कभी शरियत से दूर भी
खुदा की इबादत होती है
कभी मस्जिद में जाके भी
नमाज का मुका छुट जाता है

कभी परयो में भी अपने मिल
जाते हैं इस कदर
की उपर वाले की रहमत में
सुकून नजर आता है

कभी गुमनामी में पसरे अंधेरो
से भी आती है एक रोशनी
कभी उजालो में भी
सर छुपाये रहते हैं हम
कभी दिल की बाते बताने में
लग जाते हैं सालो
कभी इश्क घर बैठे हो जाता है

कभी हर बात में रंजो गम की
तफसील होती है
कभी इशारो में भी
इश्क परवान चढ़ जाता है

वह रे खुदा क्या दुनिया बनाई
है तुने गजब की
कभी दूर लगता है तू तो
कभी दिल में मक्का मदीना नजर आता है

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