| कभी मैं जाता था अनिश्चय ही उस घोर अन्धकार में जहा हीनता पनप चुकी और घर कर चुकी उस संसार में मेरी यादो के पिटारे को यु खोल्हा तो व्यर्थ है मेरी संवेदनाओ का अब कही कोई मूल्य नही क्यों कहते है लोग की अबूझ पहेली है ये संसार मैं तो अभी तक अकथ अनकहा सच ही रह गया मेरी उन्मादी भावनाओ को समझा के भी मैं इक छोटा सा संवाद रह गया कब पहचानेगा ये जग मेरा मूल्य की कभी कोई शुरुआत करेगा मेरी बलि वेदी पे चढ़ता रहा है हमेशा मानवीय मूल्यों का रक्त मैं तो तुम्हारे ही दिल का एक टुकडा था मुझे तुमने अलग किया आज जब जरुरत है तुम्हे मेरी तो भी तुम अनजान बनते हो आओ मुझे पहचानो अपने अंदर के उस स्नेह का मोल जानो बढ़ जाओ लेके मसाल उस प्यार की जिसका अब को मूल्य न रहा मैं बसता हु हर मानव मात्र की रगों के बस एक बार दिल से बुलाओ इससे पहले की मैं खो दू अस्तित्व अपना तुम मुझे फ़िर से जगाओ |
Tuesday, October 6, 2009
pyar
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