ये हवा में उड़ते पत्ते कहते इक अनजान कहानी कभी ये भी किसी साख पे लगे हुए इनकी भी थी एक जिंदगानी ये भी बसाये थे बसेरा अपना जुड़े हुए थे जड़ो से अपनी झोके हवा के लगने पैर भी विश्वास था इनके मन में विश्वास था इक साथ का एक अहसास का की किसी भी पल में जो न डगमगायेगा चाहे आहे कितने भी तूफ़ान इनका पेड़ साथ निभाएगा नियति को कोई जान न पाया पेल भर में ही जुदा कर दिया एक जोर की आंधी ने दूर कर दिया इनको इनके विश्वास से छूट गया वो बसेरा और बहा ले गया इनको नए संसार में जहा कोई ना था इनका अपना ना कोई साहारा था न कोई सपना पैर ये फ़िर भी अडिग रहे फ़िर से अपने संबल को संजोया फ़िर से शुरू की एक नयी कहानी फ़िर से जिंदगी के धागों को पिरोया फ़िर से करने को अक नयी शुरुआत फ़िर से बसाने को अक नया जहाँ फ़िर से सँभालने को टूटे अरमान फ़िर से पाने को अपना अस्तित्व |
Saturday, October 10, 2009
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