Thursday, October 1, 2009

वो झिलमिलाती चांदनी से
छल के आती रौशनी
वो जगमगाते दीपकों की
टिमटिमाती रोशनी
वो शादी के शामियाने में स्
आ रही गानों की आवाज
वो नन्हे नन्हे हाथो में पकड़ी हुई
बिजलियों की रोशनी
किसी के घर के द्वार पे वो
कैसे उजाला बिखरा रहे
और इस छोटी उमर में कितना बोझा
उठा रहे
कहने को तो शादी की जगह को रोशनी से
भर रहे
पैर अपनी आँखों के आंसुओ को
दिल में जज्ब कर रहे
कोई उन्हें छोटू पुकारे
कोई सी सी कह के बुला रहे
कोई दे इन्हें भद्दी सी गाली
कोई झिद्कार से दूर भगा रहे
शादी के इससजीले मंडप मे
ये मैले कपडे पहने हुए
क्यों अपनी नन्ही आँखों से
खाने की और ताकते
क्या मालूम नहीं ईनको की ये
बीस रूपये भाड़े पे आते हैं
ऐसे सुहाने सपने ऐसे छोटी
आँखों को नहीं सुहाते हैं
ये कर रहे इन्तेजार कुछ झूठन बच जाने


इन चमकती बिजलियों के बंद हो जाने का
इन झिलमिलाती रोशनियों के मद्दम हो जाने का
वो ही हाथ जो अब तक थामे थे
जिल्मिलाती रोशनी

No comments:

Post a Comment