अकसर उस राह से गुजरते
मेरी नजर पड़ जाती थी
उस अकेली खड़ी लड़की पे
कभी गौर किया नही
या कहो की समय मिला नही
उस अकेली खड़ी लड़की पे
देखा था उसे सरे रह लोगो से बतियाते
कभी किसी को दुत्कारते
तो कभी किसी के साथ जाते
हमेशा अचम्भा था की कौन है
कभी नजर न गिराई
उस अकेली खड़ी लड़की पे
देखा एक दिन उसे रोते हुए
तो मन में कसक उठी
उससे बाते करने की
मालूमात करने की
की क्या वजह रही होगी
उसके यु अंशु बहाने की
यु लोगो को अपना दुःख दिखाने की
मैंने यु ही पूछा की क्या बात हुई
देवीजी की आप इतनी खफा है
कोई गम है या कोई बात है
सब ठीक तो हालात है?
उसने बोला की वो जिस्म बेचा कर
रोटी कमाती है
उसी कलि कमाई से अपना
छोटा सा घर चलाती है
अपनी छोटी बहन और अपने भाई को
बनाना चाहती है इंसान भला
इस कलि दुनिया के फेर से
उनकी जिंदगी महफूज रखना चाहती है
आज ३ दिन से मिला नही कोई
ग्राहक नया
और जला नही है घर में उसके
२ दिन से चुल्हा
इसी बात का डर सताता है उसे
यही वजह रुलाता है उसे
मैंने कहा छोड़ क्यों नही देती
आप ये धंधा जो है गिरा हुआ
पैर उसने कहा जी कौन नही है
अपने ईमान से फिरा हुआ
यहाँ कम से कम लोग भूख मिटाने ही आते हैं
बहार दुनिया में तो है भूखे भेदिये
जो अच्छे अच्छे इंसानों को खा जाते है
नही जरुरत उसे मेरी नसीहत की
यहाँ तो हर कोई नोचने ही आता है
कहा की को भावनाओ का
मूल्य समझ में आता है
कुछ शेर की खाल में भेदिये हैं
तो कुछ उससे भाई है गिरे हुए
यहाँ कोई नही ईमान वाला
सबके ईमान है फिरे हुए
क्या करना है ऐसी दुनिया की परवाह करने से
रोजी रोटी चलती नही
इमानो पे मरने से
मैं खड़ा रहा किन्किर्त्वय्मूध कुछ बाते
सोचे जाने को
अपने इस समाज की कलि सच्चाई
अपने आप को समझाने को
यहाँ नही कोई मानवता का मूल्य
यहाँ तो सब हवस में हैं अंधे
बेबस मजबूर प्रताड़ित लडकियों
के liye बस ये ही बचे हैं dhandhe
क्या बोलता मैं उसे
स्वयं ही सोच रहा की की कैसे
हम हो गए है इतने संवेदना रहित
जगह नही है उनको समाज की खिड़की पे
आज भी मेरी नजर बार बार जाती है
उस प्रताड़ित अकेली खड़ी लड़की पे
Saturday, December 5, 2009
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