Wednesday, October 28, 2009

हवाओ का कुछ असर है
की आज मौसम खुशनुमा है
एक अजीब सी शरारत है
आज फिजाओ में भी

कभी लम्हों का भी कुछ
सलीका होता है
जिंदगी की नफासत सिखलाने का
और कुछ नया बतलाने का
कभी मिल जाते हैं यु ही
अक्सर रह चलते मुसाफिर
तो कभी अपनापन नही
मिल पाताअपनों में भी

कभी शरियत से दूर भी
खुदा की इबादत होती है
कभी मस्जिद में जाके भी
नमाज का मुका छुट जाता है

कभी परयो में भी अपने मिल
जाते हैं इस कदर
की उपर वाले की रहमत में
सुकून नजर आता है

कभी गुमनामी में पसरे अंधेरो
से भी आती है एक रोशनी
कभी उजालो में भी
सर छुपाये रहते हैं हम
कभी दिल की बाते बताने में
लग जाते हैं सालो
कभी इश्क घर बैठे हो जाता है

कभी हर बात में रंजो गम की
तफसील होती है
कभी इशारो में भी
इश्क परवान चढ़ जाता है

वह रे खुदा क्या दुनिया बनाई
है तुने गजब की
कभी दूर लगता है तू तो
कभी दिल में मक्का मदीना नजर आता है
बारिश की बूंदों में खेलते
बच्चो की किल्कारिया
कितनी खुश औरमासूम है
जिंदगानी उनकी
न मन में कोई शिकवा
न कोई गिला किसी से
अपने में मस्त बसाये
रहते हैं अपनी छोटी सी दुनिया
ये बच्चे समझाते हैं हमे
इस जिंदगी का असली मतलब
असली मकसद
एक तरीका जिंदगानी बिताने का
हर चल फरेब से दूर ये बच्चे
हमे सलीका सीखते है
नफासत से जिंदगी बिताने का
ये देते है हमे सीख
की कैसे बिना दुसरो का बुरा किए
भी अच्छाई से नाता जोड़ा जाता है
कैसे घृणा इर्ष्या से दूर रह कर
ही प्रेम जिंदगी में आता है
कैसे कुछ त्याग करके मिलती
है खुसी अपार
इस छल कपट से परे भी
हो सकता है इक संसार
काश हर कोई बच्चा बन जाता
फ़िर दुनिया में न कोई दुखी रह पता
सब रहते अपने में मस्त
और न होते दुसरे की खुसी से ट्रस्ट
ये बच्चे भी कैसी बाते सिखलाते हैं
हमे जीने का सलीका बतलाते है

Wednesday, October 21, 2009

ये तेरी दिवाली
ये मेरी दिवाली
तेरे घर के गुलशन हर कोने में
चमकते दियो की रोशनी
कोना कोना जगमगा रहा
मेरे घर पे कब्रिस्तान का
साया है मंडरा रहा
मेरे यहाँ भी रोशनी है
पैर एक वक्त की रोटी की आशाओं की
मेरे घर भी जगमग है
मेरी अधूरी तमन्नाओ की
लोग तो आते तेरे घर भी है
मिलने को बतियाने को
इस दिवाली के मौके पैर
तेरे यहाँ खुशिया बंटाने को
तेरे घर से आती खुशबु
उन मिठाईओ की
मेरे घर भी लोग आते हैं जाते है
पैर मुझे दुत्कारने को
मेरे यहाँ भी आती है खुशबु
पैर मेरे मन में छुपी ख्वाहिशो की
तेरे बच्चे भी खुश है रोते हैं
मचलते हैं पटाखे छुडाने को
और नाराज हो जाते हैं
मेरे यहाँ भी बच्चे रोते है
पैर भूख से बिलबिलाने को
तेरे घर की जलती बुझती रोशनियों से
गरम होते मेरे आशियाने को
आज भी इन्तेजार है अगली दिवाली का आने को
तेरे इतना बड़े घर में भी सच की कंगाली है
मेरी इस छोटी सी झोंपडे में बसती तंगहाली है
ये तेरी दिवाली है
ये मेरी दिवाली है

Saturday, October 10, 2009

मेरे इरादे जान ले तू
हामुझे पहचान ले तू
मेरी हर नाकाम कोशिश
को अदद अंजाम दे तू
कब से गडाये बैठा हु मैं
निगाही तेरी रहो पैर
कब से सजाये बैठा हु मैं
सपने तेरे वायदों पर
वो वायदे जो तुने किए
साथ मेरा निभाने को
हर पल हर लम्हा
मेरे साथ बिताने को
देने मेरा साथ मेरे हर बुरे वक्त में
और मेरे हर गम में हाथ बंटाने का
तेरे सरे
ये हवा में उड़ते पत्ते
कहते इक अनजान कहानी
कभी ये भी किसी साख पे लगे हुए
इनकी भी थी एक जिंदगानी
ये भी बसाये थे बसेरा अपना
जुड़े हुए थे जड़ो से अपनी
झोके हवा के लगने पैर भी
विश्वास था इनके मन में
विश्वास था इक साथ का
एक अहसास का
की किसी भी पल में
जो न डगमगायेगा
चाहे आहे कितने भी तूफ़ान
इनका पेड़ साथ निभाएगा
नियति को कोई जान न पाया
पेल भर में ही जुदा कर दिया
एक जोर की आंधी ने
दूर कर दिया इनको इनके विश्वास से
छूट गया वो बसेरा
और बहा ले गया इनको नए संसार में
जहा कोई ना था इनका अपना
ना कोई साहारा था न कोई सपना
पैर ये फ़िर भी अडिग रहे
फ़िर से अपने संबल को संजोया
फ़िर से शुरू की एक नयी कहानी
फ़िर से जिंदगी के धागों को पिरोया
फ़िर से करने को अक नयी शुरुआत
फ़िर से बसाने को अक नया जहाँ
फ़िर से सँभालने को टूटे अरमान
फ़िर से पाने को अपना अस्तित्व

Wednesday, October 7, 2009

जर्रा जर्रा संवाद करे
रह रह कर तुझको याद करे
तेरे उस भोलेपन को जालिम
मिलने के ये फरियाद करे
कब उस निश्चल हँसी को पायेगा
ये दिन गिन गिन के रात करे
तेरी एक छवि सुहानी पाने को
ये रह रह कर फरियाद करे

तू अति सुंदर रूकी मालिक है
ये तेरे हुस्न का प्यासा है
तू कोमलांगी मृगनयनी है
इस दिल को तेरी अभ्लाषा है
जाने कब वो दिन आएगा
जब तू मेरे जीवन में आएगी
तू मेरी इस सुनसान जिंदगी में
सावन की रिम झिम लाएगी

मैं तेरी पूजा करता हु
दिन रात आहे भरता हु
तुझमे अपना भगवान् बसा के
तेरी तस्वीर मदिर में रखता हु

कब ख़तम होगा मेरा ये इन्तेजार कठिन
तू कब मुझसे मिलेगी और
कब मेरी तमन्ना पुरी होगी
कब तू मुझसे शर्माएगी
ये इन्तेजार तो काफ़ी हु
कब मिलने की रुत आएगी


Tuesday, October 6, 2009

pyar

कभी मैं जाता था अनिश्चय ही
उस घोर अन्धकार में
जहा हीनता पनप चुकी
और घर कर चुकी
उस संसार में
मेरी यादो के पिटारे को
यु खोल्हा तो व्यर्थ है
मेरी संवेदनाओ का
अब कही कोई मूल्य नही

क्यों कहते है लोग की
अबूझ पहेली है ये संसार
मैं तो अभी तक अकथ अनकहा
सच ही रह गया
मेरी उन्मादी भावनाओ को
समझा के भी
मैं इक छोटा सा संवाद रह गया

कब पहचानेगा ये जग मेरा मूल्य
की कभी कोई शुरुआत करेगा
मेरी बलि वेदी पे चढ़ता रहा है
हमेशा मानवीय मूल्यों का रक्त

मैं तो तुम्हारे ही दिल का एक टुकडा था
मुझे तुमने अलग किया
आज जब जरुरत है तुम्हे मेरी
तो भी तुम अनजान बनते हो

आओ मुझे पहचानो
अपने अंदर के उस स्नेह का मोल जानो
बढ़ जाओ लेके मसाल उस प्यार की
जिसका अब को मूल्य न रहा

मैं बसता हु हर मानव मात्र की रगों के
बस एक बार दिल से बुलाओ
इससे पहले की मैं खो दू अस्तित्व अपना
तुम मुझे फ़िर से जगाओ
मेरी तंगहाली देख के
होता खुश ये सारा जमाना
मैंने तो छोड़ी सारी अभिलाशाये
मुझे नही अब यहाँ ठौर बनाना
मेरी अभिव्यक्ति की बंदिश को
मैं देख नही सकता यु
खुली आँखों से
इससे पहले समाप्त करू मैं
अपनी अजब कहानी को

मेरी पैरवी का वक्त नही है
मैं तो ठहरा एक निश्छल धारा
मेरे शब्दों को याद रखेगा
मेरे पीछे ये संसार सारा

मैं कहता हु की मेरी खुशिया
तो बस चुकी उस फ़कीर की यादो में
जो आज भी मदमस्त होके
घूम रहा आवारा सडको पे

मैं अपनी मन की करने वाला
मुझे कहा भये ये उन्मादी
कही कोई हिंसा करता है
कही अनैतिकता ही आजादी

आज न मुझसे कहने तुम रुकने की
मैं जाता हु लेके ये अपना पिटारा
एक ऐसे जहा की और चला मैं
जहा बहती हो प्यार स्नेह की धारा

Thursday, October 1, 2009

वो झिलमिलाती चांदनी से
छल के आती रौशनी
वो जगमगाते दीपकों की
टिमटिमाती रोशनी
वो शादी के शामियाने में स्
आ रही गानों की आवाज
वो नन्हे नन्हे हाथो में पकड़ी हुई
बिजलियों की रोशनी
किसी के घर के द्वार पे वो
कैसे उजाला बिखरा रहे
और इस छोटी उमर में कितना बोझा
उठा रहे
कहने को तो शादी की जगह को रोशनी से
भर रहे
पैर अपनी आँखों के आंसुओ को
दिल में जज्ब कर रहे
कोई उन्हें छोटू पुकारे
कोई सी सी कह के बुला रहे
कोई दे इन्हें भद्दी सी गाली
कोई झिद्कार से दूर भगा रहे
शादी के इससजीले मंडप मे
ये मैले कपडे पहने हुए
क्यों अपनी नन्ही आँखों से
खाने की और ताकते
क्या मालूम नहीं ईनको की ये
बीस रूपये भाड़े पे आते हैं
ऐसे सुहाने सपने ऐसे छोटी
आँखों को नहीं सुहाते हैं
ये कर रहे इन्तेजार कुछ झूठन बच जाने


इन चमकती बिजलियों के बंद हो जाने का
इन झिलमिलाती रोशनियों के मद्दम हो जाने का
वो ही हाथ जो अब तक थामे थे
जिल्मिलाती रोशनी