| हवाओ का कुछ असर है की आज मौसम खुशनुमा है एक अजीब सी शरारत है आज फिजाओ में भी कभी लम्हों का भी कुछ सलीका होता है जिंदगी की नफासत सिखलाने का और कुछ नया बतलाने का कभी मिल जाते हैं यु ही अक्सर रह चलते मुसाफिर तो कभी अपनापन नही मिल पाताअपनों में भी कभी शरियत से दूर भी खुदा की इबादत होती है कभी मस्जिद में जाके भी नमाज का मुका छुट जाता है कभी परयो में भी अपने मिल जाते हैं इस कदर की उपर वाले की रहमत में सुकून नजर आता है कभी गुमनामी में पसरे अंधेरो से भी आती है एक रोशनी कभी उजालो में भी सर छुपाये रहते हैं हम कभी दिल की बाते बताने में लग जाते हैं सालो कभी इश्क घर बैठे हो जाता है कभी हर बात में रंजो गम की तफसील होती है कभी इशारो में भी इश्क परवान चढ़ जाता है वह रे खुदा क्या दुनिया बनाई है तुने गजब की कभी दूर लगता है तू तो कभी दिल में मक्का मदीना नजर आता है |
Wednesday, October 28, 2009
बारिश की बूंदों में खेलते
बच्चो की किल्कारिया
कितनी खुश औरमासूम है
जिंदगानी उनकी
न मन में कोई शिकवा
न कोई गिला किसी से
अपने में मस्त बसाये
रहते हैं अपनी छोटी सी दुनिया
ये बच्चे समझाते हैं हमे
इस जिंदगी का असली मतलब
असली मकसद
एक तरीका जिंदगानी बिताने का
हर चल फरेब से दूर ये बच्चे
हमे सलीका सीखते है
नफासत से जिंदगी बिताने का
ये देते है हमे सीख
की कैसे बिना दुसरो का बुरा किए
भी अच्छाई से नाता जोड़ा जाता है
कैसे घृणा इर्ष्या से दूर रह कर
ही प्रेम जिंदगी में आता है
कैसे कुछ त्याग करके मिलती
है खुसी अपार
इस छल कपट से परे भी
हो सकता है इक संसार
काश हर कोई बच्चा बन जाता
फ़िर दुनिया में न कोई दुखी रह पता
सब रहते अपने में मस्त
और न होते दुसरे की खुसी से ट्रस्ट
ये बच्चे भी कैसी बाते सिखलाते हैं
हमे जीने का सलीका बतलाते है
बच्चो की किल्कारिया
कितनी खुश औरमासूम है
जिंदगानी उनकी
न मन में कोई शिकवा
न कोई गिला किसी से
अपने में मस्त बसाये
रहते हैं अपनी छोटी सी दुनिया
ये बच्चे समझाते हैं हमे
इस जिंदगी का असली मतलब
असली मकसद
एक तरीका जिंदगानी बिताने का
हर चल फरेब से दूर ये बच्चे
हमे सलीका सीखते है
नफासत से जिंदगी बिताने का
ये देते है हमे सीख
की कैसे बिना दुसरो का बुरा किए
भी अच्छाई से नाता जोड़ा जाता है
कैसे घृणा इर्ष्या से दूर रह कर
ही प्रेम जिंदगी में आता है
कैसे कुछ त्याग करके मिलती
है खुसी अपार
इस छल कपट से परे भी
हो सकता है इक संसार
काश हर कोई बच्चा बन जाता
फ़िर दुनिया में न कोई दुखी रह पता
सब रहते अपने में मस्त
और न होते दुसरे की खुसी से ट्रस्ट
ये बच्चे भी कैसी बाते सिखलाते हैं
हमे जीने का सलीका बतलाते है
Wednesday, October 21, 2009
ये तेरी दिवाली
ये मेरी दिवाली
तेरे घर के गुलशन हर कोने में
चमकते दियो की रोशनी
कोना कोना जगमगा रहा
मेरे घर पे कब्रिस्तान का
साया है मंडरा रहा
मेरे यहाँ भी रोशनी है
पैर एक वक्त की रोटी की आशाओं की
मेरे घर भी जगमग है
मेरी अधूरी तमन्नाओ की
लोग तो आते तेरे घर भी है
मिलने को बतियाने को
इस दिवाली के मौके पैर
तेरे यहाँ खुशिया बंटाने को
तेरे घर से आती खुशबु
उन मिठाईओ की
मेरे घर भी लोग आते हैं जाते है
पैर मुझे दुत्कारने को
मेरे यहाँ भी आती है खुशबु
पैर मेरे मन में छुपी ख्वाहिशो की
तेरे बच्चे भी खुश है रोते हैं
मचलते हैं पटाखे छुडाने को
और नाराज हो जाते हैं
मेरे यहाँ भी बच्चे रोते है
पैर भूख से बिलबिलाने को
तेरे घर की जलती बुझती रोशनियों से
गरम होते मेरे आशियाने को
आज भी इन्तेजार है अगली दिवाली का आने को
तेरे इतना बड़े घर में भी सच की कंगाली है
मेरी इस छोटी सी झोंपडे में बसती तंगहाली है
ये तेरी दिवाली है
ये मेरी दिवाली है
ये मेरी दिवाली
तेरे घर के गुलशन हर कोने में
चमकते दियो की रोशनी
कोना कोना जगमगा रहा
मेरे घर पे कब्रिस्तान का
साया है मंडरा रहा
मेरे यहाँ भी रोशनी है
पैर एक वक्त की रोटी की आशाओं की
मेरे घर भी जगमग है
मेरी अधूरी तमन्नाओ की
लोग तो आते तेरे घर भी है
मिलने को बतियाने को
इस दिवाली के मौके पैर
तेरे यहाँ खुशिया बंटाने को
तेरे घर से आती खुशबु
उन मिठाईओ की
मेरे घर भी लोग आते हैं जाते है
पैर मुझे दुत्कारने को
मेरे यहाँ भी आती है खुशबु
पैर मेरे मन में छुपी ख्वाहिशो की
तेरे बच्चे भी खुश है रोते हैं
मचलते हैं पटाखे छुडाने को
और नाराज हो जाते हैं
मेरे यहाँ भी बच्चे रोते है
पैर भूख से बिलबिलाने को
तेरे घर की जलती बुझती रोशनियों से
गरम होते मेरे आशियाने को
आज भी इन्तेजार है अगली दिवाली का आने को
तेरे इतना बड़े घर में भी सच की कंगाली है
मेरी इस छोटी सी झोंपडे में बसती तंगहाली है
ये तेरी दिवाली है
ये मेरी दिवाली है
Saturday, October 10, 2009
मेरे इरादे जान ले तू हामुझे पहचान ले तू मेरी हर नाकाम कोशिश को अदद अंजाम दे तू कब से गडाये बैठा हु मैं निगाही तेरी रहो पैर कब से सजाये बैठा हु मैं सपने तेरे वायदों पर वो वायदे जो तुने किए साथ मेरा निभाने को हर पल हर लम्हा मेरे साथ बिताने को देने मेरा साथ मेरे हर बुरे वक्त में और मेरे हर गम में हाथ बंटाने का तेरे सरे |
ये हवा में उड़ते पत्ते कहते इक अनजान कहानी कभी ये भी किसी साख पे लगे हुए इनकी भी थी एक जिंदगानी ये भी बसाये थे बसेरा अपना जुड़े हुए थे जड़ो से अपनी झोके हवा के लगने पैर भी विश्वास था इनके मन में विश्वास था इक साथ का एक अहसास का की किसी भी पल में जो न डगमगायेगा चाहे आहे कितने भी तूफ़ान इनका पेड़ साथ निभाएगा नियति को कोई जान न पाया पेल भर में ही जुदा कर दिया एक जोर की आंधी ने दूर कर दिया इनको इनके विश्वास से छूट गया वो बसेरा और बहा ले गया इनको नए संसार में जहा कोई ना था इनका अपना ना कोई साहारा था न कोई सपना पैर ये फ़िर भी अडिग रहे फ़िर से अपने संबल को संजोया फ़िर से शुरू की एक नयी कहानी फ़िर से जिंदगी के धागों को पिरोया फ़िर से करने को अक नयी शुरुआत फ़िर से बसाने को अक नया जहाँ फ़िर से सँभालने को टूटे अरमान फ़िर से पाने को अपना अस्तित्व |
Wednesday, October 7, 2009
| जर्रा जर्रा संवाद करे रह रह कर तुझको याद करे तेरे उस भोलेपन को जालिम मिलने के ये फरियाद करे कब उस निश्चल हँसी को पायेगा ये दिन गिन गिन के रात करे तेरी एक छवि सुहानी पाने को ये रह रह कर फरियाद करे तू अति सुंदर रूकी मालिक है ये तेरे हुस्न का प्यासा है तू कोमलांगी मृगनयनी है इस दिल को तेरी अभ्लाषा है जाने कब वो दिन आएगा जब तू मेरे जीवन में आएगी तू मेरी इस सुनसान जिंदगी में सावन की रिम झिम लाएगी मैं तेरी पूजा करता हु दिन रात आहे भरता हु तुझमे अपना भगवान् बसा के तेरी तस्वीर मदिर में रखता हु कब ख़तम होगा मेरा ये इन्तेजार कठिन तू कब मुझसे मिलेगी और कब मेरी तमन्ना पुरी होगी कब तू मुझसे शर्माएगी ये इन्तेजार तो काफ़ी हु कब मिलने की रुत आएगी |
Tuesday, October 6, 2009
pyar
| कभी मैं जाता था अनिश्चय ही उस घोर अन्धकार में जहा हीनता पनप चुकी और घर कर चुकी उस संसार में मेरी यादो के पिटारे को यु खोल्हा तो व्यर्थ है मेरी संवेदनाओ का अब कही कोई मूल्य नही क्यों कहते है लोग की अबूझ पहेली है ये संसार मैं तो अभी तक अकथ अनकहा सच ही रह गया मेरी उन्मादी भावनाओ को समझा के भी मैं इक छोटा सा संवाद रह गया कब पहचानेगा ये जग मेरा मूल्य की कभी कोई शुरुआत करेगा मेरी बलि वेदी पे चढ़ता रहा है हमेशा मानवीय मूल्यों का रक्त मैं तो तुम्हारे ही दिल का एक टुकडा था मुझे तुमने अलग किया आज जब जरुरत है तुम्हे मेरी तो भी तुम अनजान बनते हो आओ मुझे पहचानो अपने अंदर के उस स्नेह का मोल जानो बढ़ जाओ लेके मसाल उस प्यार की जिसका अब को मूल्य न रहा मैं बसता हु हर मानव मात्र की रगों के बस एक बार दिल से बुलाओ इससे पहले की मैं खो दू अस्तित्व अपना तुम मुझे फ़िर से जगाओ |
मेरी तंगहाली देख के
होता खुश ये सारा जमाना
मैंने तो छोड़ी सारी अभिलाशाये
मुझे नही अब यहाँ ठौर बनाना
मेरी अभिव्यक्ति की बंदिश को
मैं देख नही सकता यु
खुली आँखों से
इससे पहले समाप्त करू मैं
अपनी अजब कहानी को
मेरी पैरवी का वक्त नही है
मैं तो ठहरा एक निश्छल धारा
मेरे शब्दों को याद रखेगा
मेरे पीछे ये संसार सारा
मैं कहता हु की मेरी खुशिया
तो बस चुकी उस फ़कीर की यादो में
जो आज भी मदमस्त होके
घूम रहा आवारा सडको पे
मैं अपनी मन की करने वाला
मुझे कहा भये ये उन्मादी
कही कोई हिंसा करता है
कही अनैतिकता ही आजादी
आज न मुझसे कहने तुम रुकने की
मैं जाता हु लेके ये अपना पिटारा
एक ऐसे जहा की और चला मैं
जहा बहती हो प्यार स्नेह की धारा
होता खुश ये सारा जमाना
मैंने तो छोड़ी सारी अभिलाशाये
मुझे नही अब यहाँ ठौर बनाना
मेरी अभिव्यक्ति की बंदिश को
मैं देख नही सकता यु
खुली आँखों से
इससे पहले समाप्त करू मैं
अपनी अजब कहानी को
मेरी पैरवी का वक्त नही है
मैं तो ठहरा एक निश्छल धारा
मेरे शब्दों को याद रखेगा
मेरे पीछे ये संसार सारा
मैं कहता हु की मेरी खुशिया
तो बस चुकी उस फ़कीर की यादो में
जो आज भी मदमस्त होके
घूम रहा आवारा सडको पे
मैं अपनी मन की करने वाला
मुझे कहा भये ये उन्मादी
कही कोई हिंसा करता है
कही अनैतिकता ही आजादी
आज न मुझसे कहने तुम रुकने की
मैं जाता हु लेके ये अपना पिटारा
एक ऐसे जहा की और चला मैं
जहा बहती हो प्यार स्नेह की धारा
Thursday, October 1, 2009
वो झिलमिलाती चांदनी से
छल के आती रौशनी
वो जगमगाते दीपकों की
टिमटिमाती रोशनी
वो शादी के शामियाने में स्
आ रही गानों की आवाज
वो नन्हे नन्हे हाथो में पकड़ी हुई
बिजलियों की रोशनी
किसी के घर के द्वार पे वो
कैसे उजाला बिखरा रहे
और इस छोटी उमर में कितना बोझा
उठा रहे
कहने को तो शादी की जगह को रोशनी से
भर रहे
पैर अपनी आँखों के आंसुओ को
दिल में जज्ब कर रहे
कोई उन्हें छोटू पुकारे
कोई सी सी कह के बुला रहे
कोई दे इन्हें भद्दी सी गाली
कोई झिद्कार से दूर भगा रहे
शादी के इससजीले मंडप मे
ये मैले कपडे पहने हुए
क्यों अपनी नन्ही आँखों से
खाने की और ताकते
क्या मालूम नहीं ईनको की ये
बीस रूपये भाड़े पे आते हैं
ऐसे सुहाने सपने ऐसे छोटी
आँखों को नहीं सुहाते हैं
ये कर रहे इन्तेजार कुछ झूठन बच जाने
इन चमकती बिजलियों के बंद हो जाने का
इन झिलमिलाती रोशनियों के मद्दम हो जाने का
वो ही हाथ जो अब तक थामे थे
जिल्मिलाती रोशनी
छल के आती रौशनी
वो जगमगाते दीपकों की
टिमटिमाती रोशनी
वो शादी के शामियाने में स्
आ रही गानों की आवाज
वो नन्हे नन्हे हाथो में पकड़ी हुई
बिजलियों की रोशनी
किसी के घर के द्वार पे वो
कैसे उजाला बिखरा रहे
और इस छोटी उमर में कितना बोझा
उठा रहे
कहने को तो शादी की जगह को रोशनी से
भर रहे
पैर अपनी आँखों के आंसुओ को
दिल में जज्ब कर रहे
कोई उन्हें छोटू पुकारे
कोई सी सी कह के बुला रहे
कोई दे इन्हें भद्दी सी गाली
कोई झिद्कार से दूर भगा रहे
शादी के इससजीले मंडप मे
ये मैले कपडे पहने हुए
क्यों अपनी नन्ही आँखों से
खाने की और ताकते
क्या मालूम नहीं ईनको की ये
बीस रूपये भाड़े पे आते हैं
ऐसे सुहाने सपने ऐसे छोटी
आँखों को नहीं सुहाते हैं
ये कर रहे इन्तेजार कुछ झूठन बच जाने
इन चमकती बिजलियों के बंद हो जाने का
इन झिलमिलाती रोशनियों के मद्दम हो जाने का
वो ही हाथ जो अब तक थामे थे
जिल्मिलाती रोशनी
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