Wednesday, February 10, 2010

आज हम खुश हाल है
आबाद हैं आजाद हैं
तरक्की के रास्तो पैर
हमारे कदमो के निशाँ है

वो ऊँची ऊँची इमारते
वो चौड़े चौड़े रास्ते
वो बड़े बड़े आशियाने
हैं हमारे वास्ते

पैर मैंने देखा आज
एक नया भारत एक नयी
और एक विकसित जगह पैर
जो जा रहा था नंगे पावों
हाथ गाडी पे बैठ कर

इतनी सर्दी में भी वो
था एक मिला कुचला पहने हुए
उम्र तो थी ही क्या उसकी
८ साल बीते हुए

वो भी गवाह था इस विकास का
और म्हणत थी उसकी भी एक वजह
उसने भी हाथ बंटाया था
बनाने इसे एक विकसित जगह

पर खाना खाने को नहीं थे पैसे
उसकी जेब में
वो टाक रहा था उन बड़ी इमारतों को
और याद कर रहा था बचपन में पढ़ी इबारतो को

उसे नहीं कोई शिकायत इससे
वो तो सड़क पे ही सोता है
मरने जीने का क्या ख्याल उसको
ऐसो के लिए कौन रोता है

वो मांगना जानता नहीं
उसे तो रोटी में ही रात गुजारनी है
मार्के अपनी इच्छाओ को
वो जा रहा था काम पे
वो होने को तो है एक छोटा सा बच्चा
वो कहा इच्छा को जानता
शाम को मिले खाना तो उसे
खुदा की दें मानता

वो जा रहा भरी सर्दी में
एक पतली कमीज में
उसे भी पता है कैसे जीने है
सभ्य लोगो के बीच में

वो आज भी खुश है
सराह रहा उस विकास को
फिर स सोचने लगता है
अपनी उस श्हुपी हुई आस को




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