| आज हम खुश हाल है आबाद हैं आजाद हैं तरक्की के रास्तो पैर हमारे कदमो के निशाँ है वो ऊँची ऊँची इमारते वो चौड़े चौड़े रास्ते वो बड़े बड़े आशियाने हैं हमारे वास्ते पैर मैंने देखा आज एक नया भारत एक नयी और एक विकसित जगह पैर जो जा रहा था नंगे पावों हाथ गाडी पे बैठ कर इतनी सर्दी में भी वो था एक मिला कुचला पहने हुए उम्र तो थी ही क्या उसकी ८ साल बीते हुए वो भी गवाह था इस विकास का और म्हणत थी उसकी भी एक वजह उसने भी हाथ बंटाया था बनाने इसे एक विकसित जगह पर खाना खाने को नहीं थे पैसे उसकी जेब में वो टाक रहा था उन बड़ी इमारतों को और याद कर रहा था बचपन में पढ़ी इबारतो को उसे नहीं कोई शिकायत इससे वो तो सड़क पे ही सोता है मरने जीने का क्या ख्याल उसको ऐसो के लिए कौन रोता है वो मांगना जानता नहीं उसे तो रोटी में ही रात गुजारनी है मार्के अपनी इच्छाओ को वो जा रहा था काम पे वो होने को तो है एक छोटा सा बच्चा वो कहा इच्छा को जानता शाम को मिले खाना तो उसे खुदा की दें मानता वो जा रहा भरी सर्दी में एक पतली कमीज में उसे भी पता है कैसे जीने है सभ्य लोगो के बीच में वो आज भी खुश है सराह रहा उस विकास को फिर स सोचने लगता है अपनी उस श्हुपी हुई आस को |
Wednesday, February 10, 2010
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