| मेरे सवालों का जवाब दे जिंदगी मेरे खोये हुए पालो का हिसाब दे जिंदगी मैंने तो कभी मांगा भी नहीं कुछ तुझ स अब तो मुझे अल्फाज दे जिंदगी मैं तो था हारा हुआ मुसाफिर रहो पे मुझे मुश्किलों स रूबरू तुने करवाया अब जब मंजिल लगने लगी बहुत दूर तो ना बन मेरे मकसद का नासूर जिंदगी मेरी कुछ हसीं यादो के साथ मैं जीया अपनी तनहइयो को अकेले में पीया तुने फिर भी मुझे ना जिनने दिया अब तो मेरी रह का हमसफ़र बन जिंदगी गर शामियाने में लगे हैं पाबन्द मेरे तो मेरी बेकसुरी में मददगार बन जिंदगी हारा हुआ कोई होता नहीं अपने आपसे ये तो वक्त ही धोखे पे आता है ना कोई साहिल नसीब हो मुझको फिर भी मेरी कब्र पे रहम्गार बन जिंदगी |
Thursday, February 11, 2010
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