Saturday, February 20, 2010

डाल से टुटा हुआ पत्ता
जब खो जाता है
राहो में चलती आंधियो में
तो कुछ खो सा जाता है
शायद उसका अस्तित्व
पर नहीं मरती उसकी
वो डूबी हुई
अनाकृत कल्पनाये
वो निराकार सोच
वो सपने जो उसने देखे थे
लगे हुए एक वृक्ष की
डाली पे
वो संघर्ष करता है
थमने को ,
लहरों के विरूद्ध जाने को
वो कोशिश करता है
किसी और पेड़ की जड़ो स
जुड़ जाने को
अपना खोया हुआ अस्तित्व पाने को

उसकी मनो स्थिति भांपना

कोई काम नहीं आसान

हर पल वो सोच रहा होता है

संघर्ष के लिए

बिना चिंता किया क्या ह्या पूर्व में

क्या खोया,क्या नहीं हो सका

वो नहीं मरने देता अपने अंदर की

जलती हु ज्वाला को

नहीं विलोप होने देता है

अपने सपनो को

हर मन की यही है कहानी

काश हम समझ सके

पत्ते की जुबानी

आशाये मर जाने पैर भी

नहीं मरता उसके अंदर का जज्बा

और वो कोशिश करता है

अपना राह बनाने को

अपना खोया हुआ अस्तित्व पाने ko

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