Monday, March 1, 2010

अबके जो होली आएगी

अब के जो होली आएगी
मैं रंग तेरे रंग जाउंगी
सब छोड़ छाड़ के दीं धरम
मैं तुझ में ही बस जाउंगी

कोई डाले चाहे कैसे भी रंग
मैं तेरा रंग लगाउंगी
लाल हो या गुलाल हो वो
मैं प्यार का रंग सजाऊँगी

कब से तरस रहे मेरे
ये नैना तेरे दर्शन को
अब के जो फागुन आएगा
मैं तेरी मूरत पाउंगी
सावन के झूले रीते बीते
मैं इस बार फाग का रंग लगाउंगी
अबके जो होली आएगी
मैं तुझमे रच बस जाउंगी

अब नहीं मुझे कोई चिंता
ये दुनिया क्या क्या सोचेगी
मैंने तुझको प्रियवर माना है
अब लाज शर्म की बात नहीं
मेरी नहीं कोई लालसा अब
मैं तेरे साथ ही जाउंगी
अब के जो होली आएगी
मैं तेरा रंग लगाउंगी



Friday, February 26, 2010

कुछ निराकार शब्दों की
कल्पना है ये जीवन
कुछ अनदेखे अबूझे
सपनो की कहानी है
ये जीवन
संवाद और प्रति संवाद का
के दायरे में रह कर
अपनी बातो का
तर्जुमा समझाने
का नाम है जिंदगी
अंधियारों में पनाह पाके
उजाले की शुरुआत है
जिंदगी
हर पल एक नए
सपने की शुरुआत है jindagi

Saturday, February 20, 2010

डाल से टुटा हुआ पत्ता
जब खो जाता है
राहो में चलती आंधियो में
तो कुछ खो सा जाता है
शायद उसका अस्तित्व
पर नहीं मरती उसकी
वो डूबी हुई
अनाकृत कल्पनाये
वो निराकार सोच
वो सपने जो उसने देखे थे
लगे हुए एक वृक्ष की
डाली पे
वो संघर्ष करता है
थमने को ,
लहरों के विरूद्ध जाने को
वो कोशिश करता है
किसी और पेड़ की जड़ो स
जुड़ जाने को
अपना खोया हुआ अस्तित्व पाने को

उसकी मनो स्थिति भांपना

कोई काम नहीं आसान

हर पल वो सोच रहा होता है

संघर्ष के लिए

बिना चिंता किया क्या ह्या पूर्व में

क्या खोया,क्या नहीं हो सका

वो नहीं मरने देता अपने अंदर की

जलती हु ज्वाला को

नहीं विलोप होने देता है

अपने सपनो को

हर मन की यही है कहानी

काश हम समझ सके

पत्ते की जुबानी

आशाये मर जाने पैर भी

नहीं मरता उसके अंदर का जज्बा

और वो कोशिश करता है

अपना राह बनाने को

अपना खोया हुआ अस्तित्व पाने ko

Sunday, February 14, 2010

हम बच्चे ही आगे आयेंगे

माँ मुझे बन्दुक दे दो
मुझे लड़ने जाना है
घर बैठ के नहीं देख सकती मैं
अपने लोगो को मरते हुए
इस तरह रोज रोज झगड़ते हुए

माँ बच्ची हु तो क्या हुआ
कम स कम अपने लोगो के
लिए ही कुछ कर जाउंगी
जब अपने बड़े आपस में झगड़ रहे
तो मैं ही देश बचाऊँगी

माँ कब तक यु ही रोज रोज
हम आपस में झगड़ेंगे
कब तक जात,पात ,जगह के नाम पैर
एक दुसरे का खून बहायेंगे
कब तक अपने ही लोगो में
भेदभाव फैलायेंगे

जब दुश्मन है तैयारी में
मेरी मातृभूमि कब्जाने में
और मेरे देश के बड़े लोग
व्यस्त हैं लोगो को बरगलाने में
तो अच्चा हो हम बच्चे ही
इस देश को बचायेंगे
गर बाकि लोग डरपोक है तो क्या
हम खुद का खून बहायेंगे

मैं मराठी हु,मैं कन्नड़ हु,
मैं तमिल भी हु,मैं तेलुगु हु,
मैं हु गुजराती,मैं हु बंगाली
मैं हु उड़िया मैं पैर सबसे पहले मैं
हु भारतवासी

इस देश को बनाने में
कितनो ने प्राण गवाए थे
और आज उसी धरती को माँ
हम आपस में ही बाँट रहे
अपनी भारत माता का अंचल
अपने खून स उजाड़ रहे

अब समय नहीं हैं बातो का
ये वक्त है कुछ कर जाने का
गर बड़े लड़ते रहे इस तरह
तो हम बच्चे ही आगे आयेंगे
इस देश को बचाने को
एक नयी क्रांति लायेंगे
अपनी भारत माता को
फिर स हम बचायेंगे

Thursday, February 11, 2010

आज फिर से हमने
ये कसम दोहराई है
दिल ना लगना है किसी स
ये बात खुद को समझाई है

कहा किसी को समझ में आता है
मतलब वफ़ा के तर्जुमे का
हमने जिसके साथ जिंदगी भर
रहने की कसमे खायी है

किसी को २ घडी प्यार स देख लेना
नाकाफी है
यहाँ तो लोग दिलो से खेल खेला करते हैं
हम तो ठहरे पाक दिल
हमे कहा ये इश्क फरोशी
सिखाई है

काश वो हमे देख के ही यु
नजरअंदाज कर देते
अच्चा होता हमे आज
गम-इ- दिल तो नहीं होता

एक बार गिरे ठोकर खाकर तो क्या
हमने भी अब सँभालने की
कसम उठायी है

वक्त तो परवाह करे न करे उनकी
हमने उनकी बेपरवाही की
जेहमत उठायी है
काफी मुश्किल होगा इस दिल को समझाना
पैर हमने भी अपने दिल से ही शर्त लगाई है

मेरे सवालों का जवाब
दे जिंदगी
मेरे खोये हुए पालो का
हिसाब दे जिंदगी

मैंने तो कभी मांगा भी
नहीं कुछ तुझ स
अब तो मुझे अल्फाज दे
जिंदगी

मैं तो था हारा हुआ मुसाफिर
रहो पे
मुझे मुश्किलों स रूबरू तुने
करवाया

अब जब मंजिल लगने
लगी बहुत दूर
तो ना बन मेरे मकसद
का नासूर जिंदगी

मेरी कुछ हसीं यादो के साथ मैं जीया
अपनी तनहइयो को अकेले में पीया
तुने फिर भी मुझे ना जिनने दिया
अब तो मेरी रह का हमसफ़र बन जिंदगी

गर शामियाने में लगे हैं पाबन्द मेरे
तो मेरी बेकसुरी में
मददगार बन जिंदगी

हारा हुआ कोई होता नहीं अपने आपसे
ये तो वक्त ही धोखे पे आता है
ना कोई साहिल नसीब हो मुझको
फिर भी मेरी कब्र पे रहम्गार बन जिंदगी


Wednesday, February 10, 2010

काश ना हो हर रात के बाद सवेरा
शायद कुछ जिन्दगानियो का
फलसफा येही होता है
ऐसे मिलने स तो ना मिलना अच्चा
जिसमे जुदाई का गम जुदा होता है

ऐसे ही नहीं बन जाते कुछ लोग
अपने खास
ये तो एक अहसास है जो
वक्त की कसौटी पे परख के आता है
वरना कहा इस जालिम जमाने में
कोई अपना बन जता है

जता देना सब कुछ एक बार में
हर बार हो नहीं पाटा
कुछ तो रहम-इ-दिल तो कुछ
ishq के aaine में नहीं
sambhal पाटा है

gar wajood होता aapni
tanhaiyo का तो
aksar wo hamaare saamne aa khadi hoti
aur hamaare rishto के darmiyan
बन jaati एक nayee hakeekat।

ऐसे ही chalti है jindgaani 'Panky'
Faslo का अहसास najdikiyo स
होता nahi

आज हम खुश हाल है
आबाद हैं आजाद हैं
तरक्की के रास्तो पैर
हमारे कदमो के निशाँ है

वो ऊँची ऊँची इमारते
वो चौड़े चौड़े रास्ते
वो बड़े बड़े आशियाने
हैं हमारे वास्ते

पैर मैंने देखा आज
एक नया भारत एक नयी
और एक विकसित जगह पैर
जो जा रहा था नंगे पावों
हाथ गाडी पे बैठ कर

इतनी सर्दी में भी वो
था एक मिला कुचला पहने हुए
उम्र तो थी ही क्या उसकी
८ साल बीते हुए

वो भी गवाह था इस विकास का
और म्हणत थी उसकी भी एक वजह
उसने भी हाथ बंटाया था
बनाने इसे एक विकसित जगह

पर खाना खाने को नहीं थे पैसे
उसकी जेब में
वो टाक रहा था उन बड़ी इमारतों को
और याद कर रहा था बचपन में पढ़ी इबारतो को

उसे नहीं कोई शिकायत इससे
वो तो सड़क पे ही सोता है
मरने जीने का क्या ख्याल उसको
ऐसो के लिए कौन रोता है

वो मांगना जानता नहीं
उसे तो रोटी में ही रात गुजारनी है
मार्के अपनी इच्छाओ को
वो जा रहा था काम पे
वो होने को तो है एक छोटा सा बच्चा
वो कहा इच्छा को जानता
शाम को मिले खाना तो उसे
खुदा की दें मानता

वो जा रहा भरी सर्दी में
एक पतली कमीज में
उसे भी पता है कैसे जीने है
सभ्य लोगो के बीच में

वो आज भी खुश है
सराह रहा उस विकास को
फिर स सोचने लगता है
अपनी उस श्हुपी हुई आस को