| कुछ निराकार शब्दों की कल्पना है ये जीवन कुछ अनदेखे अबूझे सपनो की कहानी है ये जीवन संवाद और प्रति संवाद का के दायरे में रह कर अपनी बातो का तर्जुमा समझाने का नाम है जिंदगी अंधियारों में पनाह पाके उजाले की शुरुआत है जिंदगी हर पल एक नए सपने की शुरुआत है jindagi |
Friday, February 26, 2010
Saturday, February 20, 2010
डाल से टुटा हुआ पत्ता उसकी मनो स्थिति भांपना कोई काम नहीं आसान हर पल वो सोच रहा होता है संघर्ष के लिए बिना चिंता किया क्या ह्या पूर्व में क्या खोया,क्या नहीं हो सका वो नहीं मरने देता अपने अंदर की जलती हु ज्वाला को नहीं विलोप होने देता है अपने सपनो को हर मन की यही है कहानी काश हम समझ सके पत्ते की जुबानी आशाये मर जाने पैर भी नहीं मरता उसके अंदर का जज्बा और वो कोशिश करता है अपना राह बनाने को अपना खोया हुआ अस्तित्व पाने ko |
Sunday, February 14, 2010
हम बच्चे ही आगे आयेंगे
| माँ मुझे बन्दुक दे दो मुझे लड़ने जाना है घर बैठ के नहीं देख सकती मैं अपने लोगो को मरते हुए इस तरह रोज रोज झगड़ते हुए माँ बच्ची हु तो क्या हुआ कम स कम अपने लोगो के लिए ही कुछ कर जाउंगी जब अपने बड़े आपस में झगड़ रहे तो मैं ही देश बचाऊँगी माँ कब तक यु ही रोज रोज हम आपस में झगड़ेंगे कब तक जात,पात ,जगह के नाम पैर एक दुसरे का खून बहायेंगे कब तक अपने ही लोगो में भेदभाव फैलायेंगे जब दुश्मन है तैयारी में मेरी मातृभूमि कब्जाने में और मेरे देश के बड़े लोग व्यस्त हैं लोगो को बरगलाने में तो अच्चा हो हम बच्चे ही इस देश को बचायेंगे गर बाकि लोग डरपोक है तो क्या हम खुद का खून बहायेंगे मैं मराठी हु,मैं कन्नड़ हु, मैं तमिल भी हु,मैं तेलुगु हु, मैं हु गुजराती,मैं हु बंगाली मैं हु उड़िया मैं पैर सबसे पहले मैं हु भारतवासी इस देश को बनाने में कितनो ने प्राण गवाए थे और आज उसी धरती को माँ हम आपस में ही बाँट रहे अपनी भारत माता का अंचल अपने खून स उजाड़ रहे अब समय नहीं हैं बातो का ये वक्त है कुछ कर जाने का गर बड़े लड़ते रहे इस तरह तो हम बच्चे ही आगे आयेंगे इस देश को बचाने को एक नयी क्रांति लायेंगे अपनी भारत माता को फिर स हम बचायेंगे |
Thursday, February 11, 2010
| आज फिर से हमने ये कसम दोहराई है दिल ना लगना है किसी स ये बात खुद को समझाई है कहा किसी को समझ में आता है मतलब वफ़ा के तर्जुमे का हमने जिसके साथ जिंदगी भर रहने की कसमे खायी है किसी को २ घडी प्यार स देख लेना नाकाफी है यहाँ तो लोग दिलो से खेल खेला करते हैं हम तो ठहरे पाक दिल हमे कहा ये इश्क फरोशी सिखाई है काश वो हमे देख के ही यु नजरअंदाज कर देते अच्चा होता हमे आज गम-इ- दिल तो नहीं होता एक बार गिरे ठोकर खाकर तो क्या हमने भी अब सँभालने की कसम उठायी है वक्त तो परवाह करे न करे उनकी हमने उनकी बेपरवाही की जेहमत उठायी है काफी मुश्किल होगा इस दिल को समझाना पैर हमने भी अपने दिल से ही शर्त लगाई है |
| मेरे सवालों का जवाब दे जिंदगी मेरे खोये हुए पालो का हिसाब दे जिंदगी मैंने तो कभी मांगा भी नहीं कुछ तुझ स अब तो मुझे अल्फाज दे जिंदगी मैं तो था हारा हुआ मुसाफिर रहो पे मुझे मुश्किलों स रूबरू तुने करवाया अब जब मंजिल लगने लगी बहुत दूर तो ना बन मेरे मकसद का नासूर जिंदगी मेरी कुछ हसीं यादो के साथ मैं जीया अपनी तनहइयो को अकेले में पीया तुने फिर भी मुझे ना जिनने दिया अब तो मेरी रह का हमसफ़र बन जिंदगी गर शामियाने में लगे हैं पाबन्द मेरे तो मेरी बेकसुरी में मददगार बन जिंदगी हारा हुआ कोई होता नहीं अपने आपसे ये तो वक्त ही धोखे पे आता है ना कोई साहिल नसीब हो मुझको फिर भी मेरी कब्र पे रहम्गार बन जिंदगी |
Wednesday, February 10, 2010
| काश ना हो हर रात के बाद सवेरा शायद कुछ जिन्दगानियो का फलसफा येही होता है ऐसे मिलने स तो ना मिलना अच्चा जिसमे जुदाई का गम जुदा होता है ऐसे ही नहीं बन जाते कुछ लोग अपने खास ये तो एक अहसास है जो वक्त की कसौटी पे परख के आता है वरना कहा इस जालिम जमाने में कोई अपना बन जता है जता देना सब कुछ एक बार में हर बार हो नहीं पाटा कुछ तो रहम-इ-दिल तो कुछ ishq के aaine में नहीं sambhal पाटा है gar wajood होता aapni tanhaiyo का तो aksar wo hamaare saamne aa khadi hoti aur hamaare rishto के darmiyan बन jaati एक nayee hakeekat। ऐसे ही chalti है jindgaani 'Panky' Faslo का अहसास najdikiyo स होता nahi |
| आज हम खुश हाल है आबाद हैं आजाद हैं तरक्की के रास्तो पैर हमारे कदमो के निशाँ है वो ऊँची ऊँची इमारते वो चौड़े चौड़े रास्ते वो बड़े बड़े आशियाने हैं हमारे वास्ते पैर मैंने देखा आज एक नया भारत एक नयी और एक विकसित जगह पैर जो जा रहा था नंगे पावों हाथ गाडी पे बैठ कर इतनी सर्दी में भी वो था एक मिला कुचला पहने हुए उम्र तो थी ही क्या उसकी ८ साल बीते हुए वो भी गवाह था इस विकास का और म्हणत थी उसकी भी एक वजह उसने भी हाथ बंटाया था बनाने इसे एक विकसित जगह पर खाना खाने को नहीं थे पैसे उसकी जेब में वो टाक रहा था उन बड़ी इमारतों को और याद कर रहा था बचपन में पढ़ी इबारतो को उसे नहीं कोई शिकायत इससे वो तो सड़क पे ही सोता है मरने जीने का क्या ख्याल उसको ऐसो के लिए कौन रोता है वो मांगना जानता नहीं उसे तो रोटी में ही रात गुजारनी है मार्के अपनी इच्छाओ को वो जा रहा था काम पे वो होने को तो है एक छोटा सा बच्चा वो कहा इच्छा को जानता शाम को मिले खाना तो उसे खुदा की दें मानता वो जा रहा भरी सर्दी में एक पतली कमीज में उसे भी पता है कैसे जीने है सभ्य लोगो के बीच में वो आज भी खुश है सराह रहा उस विकास को फिर स सोचने लगता है अपनी उस श्हुपी हुई आस को |
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