Sunday, August 30, 2009

क्यों

वो दूर गगन में उड़ते पंची
वो घर जाते गायो के
झुंडवो किलकारी मरते बच्चो के रेले
वो रात भर सुनना माँ की लोरी
वो पनघट पे जाती
नौव्युव्तियावो खेतो से आते नौजवान
वो भोर के सूरज की लाली संग
दूर किसी मस्जिद की अजान
वो सावन के झूलो का लगना
वो बारिश की बूदों का गिरना
वो माँ के अंचल में चुप
जानाऔर रस्ते में भागते धुल उडाना
वो बूढी दादी की कहानिया
वो बिल्ली के प्यारे से बच्चे
रह गया सब कुछ itnaaपीछे
मेरा मन मुझसे आज भी पुच्छे
क्यों आगे बढ़ना छोड़ देता है
बचपन की सुहानी यादो को
क्यों अपने अतीत की कहानियो को
सेज के रखते हैं हम
क्या उनका वजूद है केवल सुनाये जाना
एक पीढी से दूसरी पीढी को
क्यों पराये हो जाते है हम
इतनी जल्दी अपनी माट्टी से
क्यों खो जाते हैं अपनी इस दुनिया में जिसका कोई अस्तित्व नहीं .

Friday, August 28, 2009

samay

आज के साये में
कल छुप के आता है
कभी सामने तो कभी पीछे से
नए नए करतब दिखता है

मनुष्य तो केवल एक
मध्यम मात्र है
ये तो समय ही है
जो उसे अपनी उंगलियों पे नचाता है

गुजरे हुए कल की कुछ
अनछुई सी कविताये लेकर
आने वाले पले से पहले
उनका बिम्ब दिखाता है

ये सबसे बड़ा आलोचक है
जो आपकी हर कृति पे
अपनी चाप छोड़ जाता है
कभी अहसास से तो कभी अभ्यास से
नए नए अध्याय सिखाता है

ये आपके हर पल में भागीदार है
और आपकी हर परेशानी में साझेदार है
बिना आपका हाथ थामे भी ये
हर कठिनाई में मदद गार ही

ये तो मनु की परवर्ती ही ही ऐसी
की वो इच्छाओं के दामन में फंस कर
भूल जाता ही वो सुख की घडिया
और उसे दुर्भाग्य समझता ही
अन्यथा समय तो हमेशा
सौभाग्य ही बनकर आता है

इसको क्या नाम दू ?

जलालत भी मिले दर पे उसकी तो क्या
सुकून दीदार-ए-यार तो मिल जायेगा
वो मजबूरी को गैरत समझे तो क्या
उनका अल्फाज तो कानो में जायेगा
हम बेकदरी का देके इम्तिहान भी
न उनको प् सके तो क्या
इस बहाने उनके जेहन में हमारा ख्याल तो आएगा
हमारी बेपनाह मुहब्बत को जेल किया सरे आम तो क्या
इसी बहाने उनका बेपनाह हुस्न तो नजर आएगा
हम इश्क के इम्तिहान में बजी न मार सके तो
क्याहमारा नाम तो आशिको में गिना जाएगा
जीते जी न उनको प् सके तो क्या
मरने के बाद भी हमारी कब्र पे उनके नाम का फातिहा तो पढ़ा जायेगा

रोशनी

हर सुबह प्रकाश से तर हो
ज्यूँ निकले रोशनी
चारो दिशाओ को प्रफुल्लित
कर रही ज्यूँ रोशनी
कभी गम के अँधेरे में
कभी दुखो के साये में
कभी अपने अहसासों में
खो रही ज्यूँ रोशनी
कभी अपनों से दूर हो के
कभी सपनो से दूर हो के
अपनी आशाओं को जलाकर
आ रही ज्यूँ रोशनी
बिना थके बिना रुके
स्वयं की न परवाह किये
दूजो की चिंता में मनो
जल रही यु रोशनी
है कोई न तुझसा
आत्मा के दीपक
दुसरो के हित में लगाये
निरंतर धर्म का अपना
पालनकर रही यु रोशनी

Friday, August 14, 2009

धुंध में एक साया



कभी अनजाना saa कभी पहचाना सा
बहुत दूर था कभी to
कभी मेरे बहुत करीबथा
वो धुंध में एक साया
क्यों चाह कर भी वोकः न सका मुझसेमेरे सबसे करीब होके भिदुर था मुझसे
मैंने महसूस की थीउसकी सांसो की गर्मिउसके अन्तेर्मन की कशिशुसके हाथो की नरमी
सुनाई देता था मुझेउसके दिल का धड्कनाख्वाहिश उसके बेपनाह चाहने किरुमनियत उसके नजदीक आने की
महसूस किया था सब मैनेबिना बोले बिना बताययूसकी हर नब्ज पढ़ी थी मैनेबिना कभी उसके जताए
मेरी अकेली रातो मुस्की आहत सुकून देती थिमेरी खामोश तनहइयो मुस्की झलक खुशिय्स भर देती थी
वो मेरी सांसो में था समयावो मेरे हर पल में साथ नजर आयौसकी यादो न कभी भुला पायथा वो धुंध में एक साया

Sunday, August 9, 2009

कभी to

कभी तो तेरे दिल में भीकुछ हुआ होगा
कभी तो तुझे भी तनहइयो ने छुआ होगा
लोगो ने तो मुझे ही पत्थर मारेऔर
मुझे पागल कहाकभी तो तुने भी अपने प्यार का पागलपन महसूस किया होगा
कभी तो तू भिरोयी होगी अकेले मेकभी तो तुने भी मेरेख्बाब संजोये होंगे
कभी तो तुने भी मेरी तस्विर्सिर्हने राखी होगीऔर कभी तो तुने भी मेरे नामकी मन्नत मांगी होगी
या मैं ही तुझे न पाने के गम में यु घूमता रहतुझे पाने की खातिर हर मन्दिर का डर चूमता रहा
हर पल तेरी यादो के सजदे में जिया और हर पल तुझे में हिराब का दीदार किया
फ़िर तुने क्यों मेरी तनहइयो को मेरी तंगहाली से जोदौर मेरे उस पाकीजा प्यार कोइस तरह छोड़ा
पैर मैंने तो जिंदगी तेरे नाम की हैआज चाहे अका ही इस जहा को अन्तिम सलाम फार्म रहा हुतेरा साथ तो मुझे न मिल पाया इस जिंदगी मेपेर तेरी यादो के साथ ही कब्र में दफनाया जा रहा हु


मेरा aashiyana

कब्रों के मजमे में बैठा हूँ,
कहीं से कोईं आवाज़ नहीं आती

मैं दर्द किससे कहूं अपना
मुर्दों के समझ कोई बात नहीं आती

गम का एहसास तो जिंदा-दिलों को होता है
लाशों से क्या फरियाद करू मैं

अब तो खामोशी ही है साथी मेरी

खामोशी ही अच्छी है

कम से कम गम में साथ तो देती है

वरना जिन्दा लाशों के शहर में तो मौत का साया मंडराता है
जिन्दा अक्सों में भी मुर्दों सा सकूं नज़र आता है

कोई जिल्लत को जिंदगी समझ जिए जाता है
कोई फरेब की मौत को गले लगता है
कोई करता है अपनी गद्दारी पे गुमान तो
कोई अपने उसूलो को तक पे रख के सो जाता है

मैं तो आज इस कब्रिस्तान में ही खुश हु
मेरे साथ रोते नही तो क्या
मुझसे हमदर्दी तो जताते हैं
ये मुर्दे जीते जी नही तो क्या
मरने के बाद तो साथ निभाते हैं