Friday, November 30, 2012

मुद्दत हुई की नज़रे चार न हो पाई
बड़ी शिद्दत से जिस लम्हे का इस्तकबाल करना था
गुजारी राते जिसक इन्तेजार में हमने
आज उन रातो को तनहइयो के साये से गुजरना था
वो कसमे वादे जो हमसाया होके किये हमने
उन सबको आज कोई राह मयस्सर नहीं
राह-इ-मोहब्बत के पैमाने में शायद कुछ बुँदे बहार छलक गयी

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