Wednesday, September 16, 2009


मेरे अपने मेरे से जवाब मांगते हैं

मेरी सांसो का मुझसे हिसाब मांगते हैं

कभी हमारी बातो में झलकता था प्यार उनको

आज वो ही हमसे प्यार की वजह मांगते हैं

कभी अकेले में जिनको हमारा साथ लगता था सुकून

आज वो ही हमसे दूर जाने की दुआ मांगते हैं

ऐसे अपनों से तो गैर ही अच्छे कम से कम

हमसे हमारी जानतो मांगते हैं

Sunday, September 6, 2009

मातृभूमि की ललकार

आज मैं फिर से जाग गया हु
अपने शोर्य को पहचान लिया है
फिर से मेरी उंगलियों ने मुट्ठी का रूप ले लिया है
और मेरी बाजुए फड़कने लगी हैं

आज फिर मेरे माथे की शिकन ने चिंतन का रूप लिया है
आज फिर मेरे अंडर धधकती प्रितिशोध की ज्वाला जल उठी है
आज फिर मेरे पैरो की छाप लगने वाली है
अब न कोई रात अमावस सी काली है

आज फिर मेरे शौर्य की गाथाये जमाना जायेगा
अब फिर से एक नया इतिहास लिखा जायेगा
अब फिर कोई अत्याचारी न जुल्म ढहा पायेगा
अब न फिर कोई कंश बन पायेगा

लाओ मुझे दे दो मेरे अस्त्र शास्त्र
पहना दो मुझे रन की पोशाक
मेरे फड़कते बाजुओ में थमा दो तलवार
अब दुनिया सुनेगी इसकी टंकार

अब मैं ना अपनी भावनाओ को हावी होने दूंगा
अब मैं युध को युध्ध की तरह से लडूंगा
आब न कोई मुझको हरा पायेगा
अब न कोई मेरी होते हुए मेरी धरा को रौंद पायेगा

अब जब तक मेरे सर पे मुकुट
धड पे सर है
तब तक न कोई नापाक इरादा इसको जमींदोज कर पायेगा
अब मेरी लाश ही मुझे मेरे इरादों से डिगा पायेगी
या तो मिटा दूंगा हर आततायी को या मेरी लाश बिच जायेगी

कर दो मेरे माथे पे तिलक मेरे रन की घडी आई है
अब नीद से जाग गया मैं
मेरी मातृभूमि ने मुझे फिर से आवाज लगाई है

Saturday, September 5, 2009

बारिश की बूंदों

ऐ बारिश की बूदों
मुझको ना ऐसे सताओ
मेरी विरह की बेला में आके
मेरी पीडा न यु बाधाओं

मैं तो विरह में संतप्त
एक विरहिणी सन्यास में
मेरे अकेलेपन में एके
न मुझे ऐसे सताओ

जाओ जाके उन प्रेमियों को
समय दो उल्लास का
जो आज भी सच्चाई से
दूर हो के जी रहे हैं

जाके बरसों उन बच्चो में
जो मस्त हैं तेरे अंचल में
जो आज भी माँ के साये में
एक नयी कहानी सी रहे हैं

जाके बरसों उन खेतो में
जो आशाओ का भंडार बने है
और उनपे निर्भर किसान भी
कर्ज के कीचड़ से सने हैं

अरे जाके पानी दो उन प्यासों को
जो आंसुओ को पी रहे हैं
और अपनों की अर्थी आँखों के सामने
उठता देख भी जी रहे हैं

मैं तो हु केवल एक वियोगिनी
जो पल पल प्रियतम को पुकारू
मेरे कलेजे को ठंडक दे सके
ऐसी कोई घड़ी निहारु
मुझे नही जरुरत तुम्हारी
मेरी आंखे मेरे स्वामी दर्शन को तरसे
फ़िर क्यों यहाँ बेवक्त आके
मेरे अंगान में तू बरसे